goddess devi – Jan Drishti News https://www.jandrishtinews.com jandrishtinews.com Sat, 13 Jun 2026 17:10:43 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0 https://www.jandrishtinews.com/wp-content/uploads/2026/04/lodo-150x150.png goddess devi – Jan Drishti News https://www.jandrishtinews.com 32 32 {“title_results”:[“श्री पार्वती नीलकंठ स्तोत्रम मलयालम बोल”]’).content_results”:[“कोच्चि, 27 अप्रैल 2024: श्री पार्वती नीलकंठ स्तोत्रम के मलयालम लिरिक्स ने हाल में हिंदू धार्मिक संगीत प्रेमियों और साहित्यिक समूहों के बीच खासा ध्यान आकर्षित किया है। इस स्तोत्र की मधुर छंदबद्ध कविताएं और गहन अर्थ इसे श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पूजनीय बनाते हैं।नीलकंठ, जो भगवान शिव का एक महत्वपूर्ण नाम है, को समर्पित यह स्तोत्र पार्वती के प्रति उनके अथाह प्रेम और भक्ति की अभिव्यक्ति है। प्रत्येक श्लोक में शिव-परिवार की दिव्यता और उनकी लीलाओं का वर्णन है, जिसमें खास तौर पर पार्वती की भक्ति का उल्लेख मिलता है। मलयालम भाषा में इस स्तोत्र की प्रस्तुति ने दक्षिण भारत के कोड़ों में इसकी पहुंच को और भी अधिक बढ़ा दिया है।धार्मिक विद्वानों का कहना है कि यह स्तोत्र न केवल आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है, बल्कि यह शिव की महिमा को भी बढ़ावा देता है। इसका संगीत स्वरूप पूजा पाठ के दौरान मंदिरों और घरों में विशेष रूप से लोकप्रिय हो रहा है। इस स्तोत्र की पढ़ाई और गायन से भक्तों को मानसिक शांति, स्वास्थ्य लाभ और मानसिक स्थिरता की अनुभूति होती है।विशेषज्ञों के अनुसार, इस स्तोत्र के हर एक पद में भगवान शिव के विभिन्न रूपों और उनकी शक्तियों का विवरण है, जो भक्तों के लिए अत्यंत प्रेरणादायक और आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है। पारंपरिक मलयालम लिपि में इसे पढ़ने और समझने से भक्तों की भक्ति में वृद्धि होती है और वे अपने दैनिक जीवन में शिव-शक्ति की भावना को महसूस कर पाते हैं।नागरिक और युवाओं के बीच भी इस स्तोत्र की लोकप्रियता व्यापक हो रही है, विशेष रूप से सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से। इससे हिंदू धार्मिक साहित्य के संरक्षण और प्रोत्साहन में भी मदद मिल रही है। सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा इस स्तोत्र के डिजिटल संस्करण और ऑडियो संसाधन भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं, जिससे यह सभी वर्गों के लिए सुलभ हो गया है।इस प्रकार, श्री पार्वती नीलकंठ स्तोत्रम न केवल एक धार्मिक ग्रंथ है, बल्कि यह सांस्कृतिक विरासत एवं आध्यात्मिक जागरूकता का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। इसके मलयालम लिरिक्स ने इसे दक्षिण भारतीय सांस्कृतिक क्षेत्र में एक विशेष स्थान दिलाया है, जो आने वाले वर्षों में भी अपनी प्रसिद्धि और श्रद्धा बनाए रखेगा।”]} https://www.jandrishtinews.com/2026/06/13/title_resultssri-parvati-neelkanth-stotram-malayalam-lyrics-content_resultskochi-27-april-2024-the-malayalam-lyrics-of-sri-parvati-neelkanth-stotram-have-recently-attracted-considerabl/ Sat, 13 Jun 2026 17:10:43 +0000 https://www.jandrishtinews.com/title_resultssri-parvati-neelkanth-stotram-malayalam-lyrics-content_resultskochi-27-april-2024-the-malayalam-lyrics-of-sri-parvati-neelkanth-stotram-have-recently-attracted-considerabl/ {“title_results”:[“श्री पार्वती नीलकंठ स्तोत्रम मलयालम बोल”]’).content_results”:[“

कोच्चि, 27 अप्रैल 2024: श्री पार्वती नीलकंठ स्तोत्रम के मलयालम लिरिक्स ने हाल में हिंदू धार्मिक संगीत प्रेमियों और साहित्यिक समूहों के बीच खासा ध्यान आकर्षित किया है। इस स्तोत्र की मधुर छंदबद्ध कविताएं और गहन अर्थ इसे श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पूजनीय बनाते हैं।

नीलकंठ, जो भगवान शिव का एक महत्वपूर्ण नाम है, को समर्पित यह स्तोत्र पार्वती के प्रति उनके अथाह प्रेम और भक्ति की अभिव्यक्ति है। प्रत्येक श्लोक में शिव-परिवार की दिव्यता और उनकी लीलाओं का वर्णन है, जिसमें खास तौर पर पार्वती की भक्ति का उल्लेख मिलता है। मलयालम भाषा में इस स्तोत्र की प्रस्तुति ने दक्षिण भारत के कोड़ों में इसकी पहुंच को और भी अधिक बढ़ा दिया है।

धार्मिक विद्वानों का कहना है कि यह स्तोत्र न केवल आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है, बल्कि यह शिव की महिमा को भी बढ़ावा देता है। इसका संगीत स्वरूप पूजा पाठ के दौरान मंदिरों और घरों में विशेष रूप से लोकप्रिय हो रहा है। इस स्तोत्र की पढ़ाई और गायन से भक्तों को मानसिक शांति, स्वास्थ्य लाभ और मानसिक स्थिरता की अनुभूति होती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस स्तोत्र के हर एक पद में भगवान शिव के विभिन्न रूपों और उनकी शक्तियों का विवरण है, जो भक्तों के लिए अत्यंत प्रेरणादायक और आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है। पारंपरिक मलयालम लिपि में इसे पढ़ने और समझने से भक्तों की भक्ति में वृद्धि होती है और वे अपने दैनिक जीवन में शिव-शक्ति की भावना को महसूस कर पाते हैं।

नागरिक और युवाओं के बीच भी इस स्तोत्र की लोकप्रियता व्यापक हो रही है, विशेष रूप से सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से। इससे हिंदू धार्मिक साहित्य के संरक्षण और प्रोत्साहन में भी मदद मिल रही है। सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा इस स्तोत्र के डिजिटल संस्करण और ऑडियो संसाधन भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं, जिससे यह सभी वर्गों के लिए सुलभ हो गया है।

इस प्रकार, श्री पार्वती नीलकंठ स्तोत्रम न केवल एक धार्मिक ग्रंथ है, बल्कि यह सांस्कृतिक विरासत एवं आध्यात्मिक जागरूकता का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। इसके मलयालम लिरिक्स ने इसे दक्षिण भारतीय सांस्कृतिक क्षेत्र में एक विशेष स्थान दिलाया है, जो आने वाले वर्षों में भी अपनी प्रसिद्धि और श्रद्धा बनाए रखेगा।

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श्री पुथनलक्कल भगवती मंदिर स्थापना दिवस 2026 | चेरपुलसेरी https://www.jandrishtinews.com/2026/06/10/sri-puthanalakkal-bhagwati-temple-foundation-day-2026-cherpulssery/ Wed, 10 Jun 2026 09:33:24 +0000 https://www.jandrishtinews.com/sri-puthanalakkal-bhagwati-temple-foundation-day-2026-cherpulssery/ चेरपुलस्सेरी से: श्री पुथानलक्कल भगवती मंदिर में आगामी 26 और 27 जून 2026 को प्रतिष्ठा दिवस और लक्षर्चना का भव्य आयोजन किया जाएगा। यह वार्षिक उत्सव मंदिर की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक प्रथाओं में से एक है, जो श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा और समर्पण के साथ जोड़ता है।

श्री पुथानलक्कल अम्मा की प्रतिष्ठा का यह समारोह क्षेत्र के लोगों के लिए मात्र एक पारंपरिक आयोजन नहीं, बल्कि उनकी आस्था और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। मंदिर परिसर में इन दो दिनों तक विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनमें बड़ी संख्या में भक्त हिस्सा लेंगे।

इस विशेष अवसर पर लक्षर्चना का आयोजन भी किया जाएगा, जिसमें भगवती की अनेक रूपों की स्तुति की जाएगी। लक्षर्चना के दौरान एक लाख (लक्ष) मंत्रों का जप मंदिर प्रांगण में भक्तों के समक्ष संपन्न होगा, जिससे पूरे वातावरण में दिव्यता का संचार होगा। यह अनुष्ठान भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करने तथा समुदाय में सौहार्द बढ़ाने में सहायक माना जाता है।

मंदिर समिति के सदस्यों ने बताया कि आयोजन की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। हर साल की तरह इस बार भी सुरक्षा व्यवस्था, स्वच्छता और प्रवासन प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जाएगा ताकि श्रद्धालु पूरे उत्सव का निर्विघ्न आनंद ले सकें। स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर आगामी दो दिनों के लिए विशेष योजना बनाई गई है, ताकि श्रद्धालु आस्था के साथ धार्मिक अनुष्ठान में सम्मिलित हो सकें।

श्री पुथानलक्कल भगवती मंदिर का यह प्रतिष्ठा दिवस न केवल धार्मिक महत्त्व रखता है बल्कि सांस्कृतिक विरासत को भी संरक्षित करने और जागरुकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आने वाले दिनों में मंदिर परंपरागत भूषणों और सजावटों से सज जाएगा तथा भक्ति गान, कथाएं एवं भजन-कीर्तन के माध्यम से श्रद्धालु भगवान की महिमा का गुणगान करेंगे।

इस उत्सव के मौके पर विभिन्न इलाकों से बड़ी संख्या में भक्त चेरपुलस्सेरी पहुंचेंगे। स्थानीय व्यवसायिक और सामुदायिक संस्थाएं भी इस आयोजन में सहयोग प्रदान कर रही हैं। मंदिर के पुजारियों ने सभी से निवेदन किया है कि वे विधि-विधान का सम्मान करें और मंदिर परिसर में अनुशासन बनाए रखें।

यह प्रतिष्ठा दिवस समारोह श्री पुथानलक्कल भगवती मंदिर की आध्यात्मिक महत्ता को पुनः स्थापित करता है और श्रद्धालुओं को एकत्रित कर सामाजिक सहयोग और धार्मिक शांति का संदेश देता है। सभी भक्तगण इस अवसर पर मंदिर जाकर भगवान की आराधना एवं आशीर्वाद प्राप्त कर सकेंगे।

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देवी काली – शक्ति, संरक्षण और ज्ञान की दिव्य माता https://www.jandrishtinews.com/2026/06/10/goddess-kali-divine-mother-of-power-protection-and-wisdom/ Wed, 10 Jun 2026 09:30:07 +0000 https://www.jandrishtinews.com/goddess-kali-divine-mother-of-power-protection-and-wisdom/ नई दिल्ली। देवी काली, जिन्हें कालिका के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में शक्ति, संरक्षण और ज्ञान की दिव्य माता के रूप में अत्यंत पूजनीय हैं। महाविद्या पंचदश के प्रथम स्थान पर स्थित देवी काली ब्रह्मांड की वह अनंत ऊर्जा हैं जो सृष्टि, संरक्षण और रूपांतरण की प्रक्रिया को स्थिर बनाती हैं। उनकी अद्भुत शक्ति और दैवीय स्वरूप भक्तों के लिए आश्रय और मार्गदर्शन का स्रोत है।

देवी काली का स्वरूप भयभीत करने वाला होने के बावजूद वे भक्तों के लिए अत्यंत करुणामय और संरक्षणकारी हैं। धार्मिक ग्रंथों में उन्हें समय और मृत्यु की देवता के रूप में भी जाना जाता है। उनके नौ रूपों के विभिन्न पूजा पाठ से भक्त शक्ति और आत्मबल अर्जित करते हैं।

वर्तमान समय में भी उनके प्रति श्रद्धा और भक्ति उतनी ही प्रगाढ़ है, जितनी प्राचीन काल में थी। हर वर्ष कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी को काली पूजा मनाई जाती है, जो देशभर में कई स्थानों पर धूमधाम से आयोजित होती है। विशेष रूप से कोलकाता का काली पूजा उत्सव विश्व प्रसिद्ध है, जहां लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं।

शास्त्रों के अनुसार, देवी काली ने राक्षसों का संहार कर धर्म की स्थिरता और हित लोक की रक्षा सुनिश्चित की। उनका रूप अंधकार और अधर्म पर ज्ञान और सत्य की विजय का प्रतीक है। यही कारण है कि वे न केवल भयावहता की देवी मानी जाती हैं, बल्कि शक्ति, समृद्धि और बुद्धि की भी अधिष्ठात्री हैं।

अध्यात्मिक जगत में उनके अतिरिक्त कोई देवता नहीं जो इतनी व्यापक ऊर्जा और दैवीय शक्ति का प्रतिनिधित्व करता हो। देवी काली का ध्यान करने से मानसिक स्थिरता, आत्म-सम्मान बढ़ता है तथा जीवन के संकटों से लड़ने की क्षमता प्राप्त होती है। इस प्रकार, वे न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र हैं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में भी उनका गहरा प्रभाव है।

इसलिए भारत में देवी काली की पूजा और उनका सम्मान सदियों से निरंतर बना हुआ है। वे शक्ति की अंतिम सीमा हैं और भक्तों के मन-मस्तिष्क में आश्वासन एवं साहस का संचार करती हैं। उनकी महिमा और दिव्यता का स्वरूप आज भी लोगों को प्रेरणा देता है कि वे सर्वत्र न्याय, शांति और धर्म के लिए खड़े रहें।

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अर्धनारीश्वर की कहानी – शिव और शक्ति का दिव्य संगम https://www.jandrishtinews.com/2026/05/24/story-of-ardhanarishwar-divine-confluence-of-shiva-and-shakti/ Sun, 24 May 2026 04:51:54 +0000 https://www.jandrishtinews.com/story-of-ardhanarishwar-divine-confluence-of-shiva-and-shakti/ अर्धनारीश्वर – शिव और पार्वती का पवित्र रूप

अर्धनारीश्वर भगवान शिव का एक अत्यंत गूढ़ और प्रतीकात्मक स्वरूप है। यह नाम ‘अर्धनारीश्वर’ का अर्थ है ‘जिसका आधा भाग नारी है’। इस पवित्र रूप में भगवान शिव और देवी पार्वती का संयोजन एक साथ दर्शाया गया है, जो पुरुष और महिला ऊर्जा के आदर्श मेल का प्रतीक है।

हिंदू धर्म में, अर्धनारीश्वर की महत्ता बहुत अधिक है क्योंकि यह यह सिद्ध करता है कि ब्रह्माण्ड में नारी और पुरुष दोनों शक्तियाँ समान रूप से महत्वपूर्ण हैं और ये बिना एक-दूसरे के अधूरे हैं। भगवान शिव का दायाँ पक्ष पुरुष रूप में है जबकि बायाँ पक्ष देवी पार्वती का स्त्री रूप दिखाता है।

ऐसा माना जाता है कि इस रूप का प्रादुर्भाव तब हुआ जब पार्वती ने शिव से यह इच्छाशक्ति मांगी कि वे उनका हिस्सा बन जाएं ताकि वे हमेशा एक साथ रहें। शिव ने इस आग्रह को स्वीकार करते हुए अपना आधा शरीर देवी के रूप में उनमें समाहित कर दिया। इस प्रकार अर्धनारीश्वर का स्वरूप उत्पन्न हुआ, जो मिलन, समानता और समरसता का अधिष्ठान है।

मूर्तिकारों और कलाकारों ने इस रूप को विविध रूपों में चित्रित किया है, जिसमें अधिकांशतः एक आधा पुरुष और आधा महिला का विन्यास होता है। धार्मिक ग्रंथों में भी अर्धनारीश्वर का उल्लेख मिलता है जो उसकी गूढ़ वैज्ञानिक और आध्यात्मिक व्याख्या प्रस्तुत करता है।

अर्धनारीश्वर की पूजा विशेष रूप से उन लोगों द्वारा की जाती है जो जीवन में संतुलन, प्रेम और एकता की चाह रखते हैं। यह रूप हमें यह सिखाता है कि पुरुष और महिला के गुण और शक्तियाँ मिलकर ही पूर्णता की प्राप्ति कर सकती हैं। यह संदेश सामाजिक और आध्यात्मिक दोनों ही स्तरों पर महत्वपूर्ण है।

अतः अर्धनारीश्वर का रूप न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि यह हमारी जीवनरेखा में एक गहरा सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश भी प्रदान करता है जो सामंजस्य एवं सहयोग की भूमिका को उजागर करता है।

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देवी काली और रक्तबीज की कथा | शक्तिशाली हिन्दू मिथक https://www.jandrishtinews.com/2026/05/18/story-of-goddess-kali-and-raktabeej-powerful-hindu-myths/ Mon, 18 May 2026 03:55:45 +0000 https://www.jandrishtinews.com/story-of-goddess-kali-and-raktabeej-powerful-hindu-myths/ नई दिल्ली। हिन्दू धर्म में देवी काली को शक्ति और विनाश की अविनाशी देवी माना जाता है। देवी पार्वती का यह प्रचंड रूप ब्रह्माण्ड की संतुलन बनाए रखने के लिए प्रकट हुआ था। इस रिपोर्ट में हम आपको रक्तबीज नामक दैत्य और देवी काली की कथा से अवगत कराएंगे जो हिन्दू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

रक्तबीज एक अत्यंत शक्तिशाली दैत्य था जिसे भगवान ब्रह्मा से विशेष वरदान प्राप्त था। उसके इस वरदान के मुताबिक, जब भी उसके शरीर से कोई रक्त का एक भी बूंद गिरती, वह उसी बूंद से एक नया दानव उत्पन्न हो जाता था। इस अद्भुत शक्ति के कारण वह लगभग अपराजेय था और उसके बढ़ते प्रभाव ने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के संतुलन को खतरे में डाल दिया था।

जब देवताओं और ऋषियों ने इसके अत्याचार से त्रस्त होकर भगवान शिव और माता पार्वती से सहायता मांगी, तब देवी पार्वती का काली रूप प्रकट हुआ। देवी काली का रूप अत्यंत भयानक और शक्तिशाली था, जो दुष्टों का संहार करता है। उन्होंने रक्तबीज का समूल नाश करने के लिए युद्ध आरंभ किया।

रक्तबीज की हर योजना विफल हो गई क्योंकि वह अपनी रक्त बूंदों से लगातार नए दानव उत्पन्न करता रहता था, लेकिन देवी काली ने अपने भयानक रूप और असीम शक्तियों से उसके रक्त को धरती पर गिरने से पहले ही निगल जातीं। जिससे नया दानव उत्पन्न नहीं हो पाया। इस तरह से वह रक्तबीज का वध कर ब्रह्माण्ड में शांति बहाल कर सकीं।

देवी काली और रक्तबीज की यह कथा न केवल शक्ति और न्याय की प्रतीक है बल्कि यह भी दर्शाती है कि दुष्ट और अन्याय की हर पहलू का अंत अंततः हो जाता है। आज भी देवी काली का यह रूप भक्तों के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा और साहस का स्रोत माना जाता है। हिन्दू धर्म की समृद्ध परंपराओं में यह कहानी उनकी महत्ता को दर्शाती है जहां शक्ति का उपयोग सृजन तथा विध्वंस दोनों के लिए होता है।

कई मंदिरों में देवी काली की पूजा बड़े श्रद्धा और भक्ति से की जाती है, खासकर कुरुक्षेत्र, कोलकाता और तमिलनाडु में उनकी महत्ता अत्यधिक है। इस कहानी के माध्यम से हमें यह शिक्षा मिलती है कि शांति और न्याय के लिए कठोर और निर्णायक कदम आवश्यक हो सकते हैं, और सच्ची शक्ति का प्रयोग सदैव धर्म की रक्षा के लिए होना चाहिए।

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श्री मुल्लक्कड्कम देवी क्षत्रिय इड़ा कुम्भाभिषेक महोत्सव https://www.jandrishtinews.com/2026/05/17/sri-mullakkadkam-devi-kshatriya-ida-kumbhabhisheka-festival/ Sun, 17 May 2026 03:58:11 +0000 https://www.jandrishtinews.com/sri-mullakkadkam-devi-kshatriya-ida-kumbhabhisheka-festival/ कोल्लम: श्री मुल्लक्कड़कम देवी क्षत्रम में आगामी मई 18 और 19, 2026 को भव्य इडा कुम्भाभिषेक महोत्सव का आयोजन किया जाएगा। यह धार्मिक महोत्सव मंदिर के इतिहास में एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पर्व के रूप में मनाया जाएगा, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के आने की उम्मीद है।

श्री मुल्लक्कड़कम देवी क्षत्रम, कोल्लम में एक प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित मंदिर है, जहां देवी मां की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस इडा कुम्भाभिषेक महोत्सव का आयोजन मंदिर की नियमित मरम्मत और नवीनीकरण के बाद उस क्षेत्र की पवित्रता बनाए रखने के लिए किया जाता है। यह समारोह धार्मिक विधियों और परंपराओं के अनुसार संपन्न होगा, जिसमें सभी अनुष्ठान विधिपूर्वक अमल में लाए जाएंगे।

महोत्सव के दौरान मंदिर परिसर में विशेष पूजा, मंत्रोच्चारण, धार्मिक भजन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जो भक्तों को आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करेंगे। आयोजक समिति ने यह भी बताया है कि इस मौका पर विभिन्न समुदायों से लोग जश्न का हिस्सा बनने आने की उम्मीद है। सुरक्षा के प्रबंध भी कड़े किए जाएंगे ताकि सभी श्रद्धालु बिना किसी परेशानी के आस्था का अनुभव कर सकें।

विशेष रूप से, इस आयोजन की प्रमुखता स्थानीय प्रशासन और धार्मिक संगठनों द्वारा भी स्वीकार की गई है, जो इसे क्षेत्रीय धार्मिक धरोहर की रक्षा और संवर्धन के महत्व का प्रतीक मानते हैं। भक्तजन इस उत्सव को लेकर बेहद उत्साहित हैं और उन्होंने अपनी सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए तैयारी शुरू कर दी है।

यह महोत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और आध्यात्मिक ऊर्जा का भी मंच होगा। इस महान अवसर पर भक्तजनों को आमंत्रित किया गया है कि वे इस पावन उत्सव में भाग लेकर अपनी धार्मिक आस्था को पुष्ट करें और सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध बनाएं।

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