Shows – Jan Drishti News https://www.jandrishtinews.com jandrishtinews.com Sat, 13 Jun 2026 17:08:43 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0 https://www.jandrishtinews.com/wp-content/uploads/2026/04/lodo-150x150.png Shows – Jan Drishti News https://www.jandrishtinews.com 32 32 तेल के बिना दुनिया कैसे बनाएं? | द स्कोप https://www.jandrishtinews.com/2026/06/13/how-to-create-a-world-without-oil-the-scope/ Sat, 13 Jun 2026 17:08:43 +0000 https://www.jandrishtinews.com/how-to-create-a-world-without-oil-the-scope/ पेट्रोलियम पर आधारित आधुनिक जीवनशैली ने न केवल हमारी सामाजिक और आर्थिक प्रगति को नया आकार दिया है, बल्कि इसके पर्यावरणीय प्रभाव भी अत्यंत गंभीर रहे हैं। द स्कोप की इस रिपोर्ट में हम पेट्रोकेमिकल्स के बिना भविष्य की राह तलाशने की चुनौती और इसके लिए किए जा रहे प्रयासों पर विस्तृत चर्चा करेंगे।

पेट्रोलियम का इतिहास 19वीं सदी के अंत से शुरू होता है, जब इसकी खोज और उपयोग बढ़ने लगा। इसके बाद से यह ऊर्जा उत्पादन, परिवहन, प्लास्टिक निर्माण, और रसायन विज्ञान के क्षेत्र में एक अनिवार्य संसाधन बन गया। दुनिया की अधिकांश इंफ्रास्ट्रक्चर और उत्पाद पेट्रोलियम आधारित पदार्थों से जुड़ी हैं।

हालांकि, पेट्रोलियम के अत्यधिक उपयोग ने पर्यावरण पर गहरा और अनपेक्षित प्रभाव डाला है। ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन, जल प्रदूषण और जैव विविधता पर नकारात्मक प्रभाव इसके कुछ प्रमुख उदाहरण हैं। जलवायु परिवर्तन की चेतावनी के प्रबल होते हुए, दुनिया भर के वैज्ञानिक और नीति निर्माता एक ऐसे विकल्प की तलाश में हैं, जो न केवल विश्वसनीय ऊर्जा प्रदान कर सके, बल्कि प्रकृति के संरक्षण में भी सहायक हो।

वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत, जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, और हाइड्रोजन ईंधन, इन विकल्पों में गिने जा रहे हैं। नए युग की तकनीकें और नवाचार पेट्रोकेमिकल्स के विकल्प खोजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उत्सर्जन घटाने, ऊर्जा दक्षता बढ़ाने, और सतत विकास के लिए ये ऊर्जा स्रोत आवश्यक हैं।

फिर भी, पेट्रोकेमिकल्स के बिना पूरी तरह नई दुनिया का निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है। इसमें न केवल तकनीकी विकास, आर्थिक स्थिरता बल्कि वैश्विक स्तर पर सहयोग और नीति निर्माण की भी आवश्यकता है। सामाजिक जागरूकता, निवेश, और वैज्ञानिक अनुसंधान इसके सफल क्रियान्वयन के आधार हैं।

इसलिए, हम एक ऐसे युग की ओर बढ़ रहे हैं जहां पर्यावरण की सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक विकास भी संभव है। द स्कोप की यह रिपोर्ट हमें याद दिलाती है कि भविष्य को सुरक्षित और स्थायी बनाने के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाना अनिवार्य है।

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देखें: NFHS-6 की व्याख्या, कैंसर में प्रगति और अधिक | हेल्थ रैप https://www.jandrishtinews.com/2026/06/07/see-nfhs-6-explained-progress-in-cancer-and-more-health-wrap/ Sun, 07 Jun 2026 06:50:16 +0000 https://www.jandrishtinews.com/see-nfhs-6-explained-progress-in-cancer-and-more-health-wrap/ देश में स्वास्थ्य और विकास के महत्वपूर्ण संकेतकों पर आधारित निष्कर्षों की जानकारी देते हुए, The Hindu की स्वास्थ्य संपादक रम्या कन्नन और वरिष्ठ सहायक संपादक जुबेदा हमीद ने 36वें Health Wrap एपिसोड में NFHS-6 सर्वे के प्रमुख परिणाम साझा किए। इस सर्वेक्षण ने भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य पर एक व्यापक दृश्य प्रस्तुत किया है, जिसमें पोषण, मातृत्व स्वास्थ्य, टीकाकरण, स्वच्छता और अन्य स्वास्थ्य से जुड़े पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई है।

NFHS-6 के आंकड़ों से पता चला है कि देश के कई क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर में कमी के साथ-साथ टीकाकरण कवरेज बढ़ाने में भी सकारात्मक रुझान देखने को मिले हैं। इसके अलावा, पोषण की स्थिति में सुधार के लिए कई राज्यों ने सुदृढ़ पहल की है, जिससे कमजोर वर्गों को लाभ मिल रहा है।

कैंसर के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है, खासकर पैनक्रियाटिक और स्तन कैंसर के इलाज में। विशेषज्ञों के अनुसार नवीनतम उपचार और तकनीकें इन प्रकार के कैंसर के रोगियों के लिए बेहतर परिणाम देने लगी हैं। नवाचार और शोध के कारण मरीजों के जीवन स्तर में सुधार हो रहा है और उनके स्वस्थ होने की संभावनाएं बढ़ रही हैं।

इसके अलावा, इस सप्ताह के अन्य सार्वजनिक स्वास्थ्य समाचारों में टर्बुलेंस रोगों के नियंत्रण, टीकाकरण अभियान, और स्वच्छता कार्यक्रमों की उन्नति शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में निरंतर सतत प्रयासों से ही बेहतर भविष्य सुनिश्चित किया जा सकता है।

स्वास्थ्य विभाग और नीति निर्माता इन आंकड़ों का उपयोग करके नई रणनीतियों का निर्माण कर रहे हैं ताकि देश के स्वास्थ्य मानकों को और ऊंचा उठाया जा सके। NFHS-6 सर्वे की रिपोर्ट से मिले ताजातरीन आंकड़ों पर आधारित यह चर्चा देश में स्वास्थ्य सुधार के मार्ग को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।

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देखें: 2026 में 11 वर्षों में सबसे कठिन सूखा, कमजोर मानसून के कारण फसल उत्पादन पर गंभीर प्रभाव https://www.jandrishtinews.com/2026/06/04/watch-worst-drought-in-11-years-in-2026-severe-impact-on-crop-production-due-to-weak-monsoon/ Thu, 04 Jun 2026 01:52:38 +0000 https://www.jandrishtinews.com/watch-worst-drought-in-11-years-in-2026-severe-impact-on-crop-production-due-to-weak-monsoon/ नई दिल्ली। देश के कृषि क्षेत्र के लिए इस वर्ष कमजोर मानसून की संभावना ने चिंता की लकीरें खींच दी हैं। भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने 2026 के मानसून को ‘अल्पवर्षा’ यानी डिफिशिएंट मानसून के रूप में वर्गीकृत किया है, जो पिछले 11 वर्षों में सबसे सूखे मानसून के संकेत दे रहा है। ऐसे में कृषि उत्पादन, जलस्रोत और कृषि अर्थव्यवस्था पर इसके संभावित असर पर नजर रखना जरूरी है।

भारत की कृषि प्रणाली पर मानसून का भारी प्रभाव होता है क्योंकि अधिकांश किसान बारिश पर ही निर्भर होते हैं। कमजोर मानसून के कारण फसलों को पर्याप्त जलप्रवाह न मिल पाने से उत्पादन में गिरावट आ सकती है। इतिहास से पता चलता है कि जब भी मानसून कमजोर रहा है, खाद्य अनाज का उत्पादन प्रभावित हुआ है, जिससे खाद्यान्न के दाम बढ़ने और किसानों की आय में कमी आई है।

साल 2014-15 के दौरान भी भारी अल्पवर्षा देखने को मिली थी, जिससे देश के कई राज्यों में जलसंसाधन गंभीर स्थिति में आ गए थे। जलाशयों का जलस्तर कम होने पर सिंचाई की क्षमता प्रभावित हुई, जिससे फसल कटाई पर विपरीत प्रभाव पड़ा। इस साल भी अगर मानसून आगामी महीनों में कमजोर रहता है, तो जलाशयों और नदियों में पानी की कमी हो सकती है, जो खेती और जलापूर्ति दोनों के लिए चुनौती बनेगी।

विशेषज्ञ बताते हैं कि कमजोर मानसून से न केवल खरीफ फसलों जैसे धान, मक्का, और गन्ना की पैदावार घटेगी, बल्कि इससे किसान आर्थिक रूप से भी प्रभावित होंगे। वित्तीय संकट के चलते किसानों को बैंक लोन और कृषि संबंधी योजनाओं का लाभ लेना मुश्किल हो सकता है। इसके अतिरिक्त, खाद्यान्न उत्पादन में कमी आने से देश की खाद्य सुरक्षा पर भी चिंता बढ़ेगी।

हालांकि, इस समस्या से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें विभिन्न उपाय कर रही हैं। जल संरक्षण, स्मार्ट सिंचाई तकनीक, और सूखे प्रतिरोधी फसलों के विकास पर जोर दिया जा रहा है। साथ ही, किसान क्रेडिट कार्ड, बीमा योजनाएं, और समर्थन मूल्य व्यवस्था को मजबूत कर किसानों को आर्थिक सहारा दिए जाने की कोशिश की जा रही है।

फसल उत्पादन पर कमजोर मानसून का असर कम करने के लिए सतत कृषि रणनीतियों को अपनाना और जल संरक्षण पर ज्यादा ध्यान देना आवश्यक होगा। किसानों को भी अपनी फसल योजना मानसून की स्तिथि के अनुसार समायोजित करनी होगी। इसके साथ ही, राष्ट्रीय खाद्य भंडार और जल स्रोतों का उचित प्रबंधन भी जरूरी है ताकि आगामी सूखा अवधि का प्रभाव न्यूनतम हो सके।

इस वर्ष का मानसून और कृषि क्षेत्र की स्थिति देश की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण संकेतक होंगी। सभी संबंधित पक्षों को मिलकर इस चुनौती का सामना करना होगा ताकि किसी भी संभव खाद्य संकट से बचा जा सके। भारत की अन्नदाता प्रणाली की मजबूती इस बात पर निर्भर करेगी कि हम इस कमजोर मानसून के प्रभावों को किस प्रकार प्रबंधित करते हैं।

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देखें: क्या बायोगैस अगला बड़ी ईंधन बनेगा https://www.jandrishtinews.com/2026/05/27/watch-will-biogas-become-the-next-big-fuel/ Wed, 27 May 2026 04:18:31 +0000 https://www.jandrishtinews.com/watch-will-biogas-become-the-next-big-fuel/ पश्चिम एशिया में युद्ध और हॉर्मुज की खाड़ी की समुद्री मार्ग की नाकाबंदी के कारण भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव ने भारत के ईंधन संकट को और गहरा दिया है। सरकार ने चार वर्षों के बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की है, साथ ही सीएनजी की कीमतें भी बढ़ाई गई हैं। यह एक संकेत है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा कितनी नाजुक है और बाहरी संकटों से कितनी प्रभावित होती है।

इस समय देश के सामने ऊर्जा विकल्पों की तलाश सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। विशेष रूप से, यह सवाल उठता है कि क्या कोई ऐसा ईंधन मौजूद है जो हम तक पहुँचने के लिए जमी हुई है और जो कई जटिलताओं का समाधान कर सकता है। इस संदर्भ में बायोगैस एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में उभर रहा है।

बायोगैस एक नवीनीकृत ऊर्जा स्रोत है, जो जैविक अपशिष्टों से निर्मित होता है। यह न केवल पर्यावरण हितैषी है बल्कि आर्थिक दृष्टिकोण से भी किफायती साबित हो सकता है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में बायोगैस उत्पादन से ईंधन की निर्भरता कम की जा सकती है, जिससे आयात पर निर्भरता घटेगी। भारत में किसानों द्वारा कूड़ा-कचरे और कृषि अवशेषों का उपयोग करके बायोगैस उत्पादन में वृद्धि हो रही है, जो आर्थिक और पर्यावरणीय रूप से लाभकारी है।

सरकार भी बायोगैस उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चला रही है। इन योजनाओं के जरिए किसानों और छोटे उद्योगों को तकनीकी सहायता एवं अनुदान दिया जा रहा है ताकि बायोगैस plantas स्थापित करने में मदद मिले। इसके अलावा, बायोगैस से उत्पन्न ऊर्जा का उपयोग घरेलू रसोई गैस, कृषि उपकरण और परिवहन के लिए भी किया जा सकता है।

हालांकि, बायोगैस को पूरी तरह अर्थव्यवस्था और ऊर्जा क्षेत्र में समाहित करने के लिए आवश्यक है कि बुनियादी ढांचे, तकनीकी ज्ञान और निवेश को बढ़ावा दिया जाए। साथ ही, जन जागरूकता बढ़ाकर इसके लाभों को व्यापक स्तर पर फैलाना जरूरी होगा।

अतः यह कहना गलत नहीं होगा कि वर्तमान ऊर्जा संकट के समय में बायोगैस एक संभावित समाधान के रूप में उभर रहा है। यह न केवल ऊर्जा की बढ़ती मांग को पूरा कर सकता है, बल्कि भारत के ऊर्जा आयात पर निर्भरता को भी कम कर सकता है। हमें इस विकल्प को पहचानना होगा और इसे विकसित करने में योगदान देना होगा ताकि स्थायी और स्वदेशी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

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