बेंगलुरु: शहर की पढ़ने की समुदाय ने अपनी एक खास पहचान बनाने के लिए एकजुट होकर ‘‘द बुकवर्म’’ नामक लोकप्रिय पुस्तकालय को दोबारा जीवित करने की पूरी कोशिश कर रही है। यह पहल न केवल किताबों के प्रति शहरवासियों की गहरी लगाव को दर्शाती है, बल्कि बेंगलुरु की सांस्कृतिक और बौद्धिक संपन्नता के बड़े चित्र को भी उजागर करती है।
‘‘द हिन्दु’’ की रिपोर्ट के अनुसार, बुकवर्म की इस पुनरुत्थान यात्रा का समर्थन कई स्थानीय पाठकों, लेखकों और किताब प्रेमियों द्वारा किया जा रहा है। कोविड-19 महामारी के दौरान और उसके बाद कई छोटे व्यवसायों की तरह इस पुस्तकालय को भी आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जिससे इसके संचालन में बाधा आई। लेकिन बेंगलुरु के साहित्यिक समुदाय ने इसे बंद होने से बचाने का बीड़ा उठाया है।
बुकवर्म के पुनः संचालन के प्रयासों में शामिल व्यक्ति बताते हैं कि सिर्फ एक किताबों की दुकान से कहीं अधिक यह जगह बेंगलुरु की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। यहां न केवल किताबें मिलती हैं, बल्कि विभिन्न साहित्यिक चर्चाएं, कार्यशालाएं और समुदाय के साथ संवाद का एक मंच भी उपलब्ध होता है।
पाठकों और स्थानीय कलाकारों के बीच ‘‘द बुकवर्म’’ ने वर्षों से एक मजबूत बंधन बनाया है। यह स्थान न सिर्फ किताबों की बिक्री केंद्र है, बल्कि एक सामुदायिक केंद्र के रूप में भी काम करता है, जो शहर के सांस्कृतिक विकास में अपनी भुमिका निभा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे पुस्तकालय और किताबों की दुकानों का अस्तित्व शहर के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह न केवल ज्ञान की पहुँच को बढ़ाता है, बल्कि नागरिकों को अपने शहर के प्रति जुड़ाव भी महसूस कराता है।
इस पहल के तहत, ‘‘द बुकवर्म’’ ने कई डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए अपने वर्गों और कार्यक्रमों को भी ऑनलाइन कर दिया है, जिससे साझा ज्ञान को और अधिक लोगों तक पहुँचाना संभव हो पाया है।
‘‘बेंगलुरु की पुस्तकों से जुड़ी यह पहल दिखाती है कि एक शहर की असली सांस्कृतिक अस्मिता उसके लोगों के साझा प्रयासों से ही मजबूत होती है। जब समुदाय मिलकर किसी लक्ष्य के प्रति समर्पित होता है, तो वह किसी भी चुनौती को पार कर सकता है।’’ — द हिन्दु

