खाड़ी क्षेत्र के देशों ने दशक पहले से ही होर्मुज की संकीर्ण जलसंधि से निर्भरता कम करने के लिए विभिन्न योजनाएं और परियोजनाएं तैयार कर रखी हैं। यह जलसंधि विश्व के ऊर्जा प्रसारण का एक महत्वपूर्ण मार्ग है, जिसमें वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा होकर गुजरता है। हाल के समय में क्षेत्रीय तनाव और परिवहन बाधाओं के कारण इन वैकल्पिक रास्तों की जांच और परीक्षण पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे प्रमुख खाड़ी देश अपनी ऊर्जा रफ्तार को सुरक्षित रखने के लिए, होर्मुज जलसंधि के पार निर्भरता घटाने के प्रयास कर रहे हैं। इनके द्वारा विकसित किए जा रहे विविधीकरण के उपायों में पाइपलाइन परियोजनाएं, नौवहन मार्गों का विस्तार और तेल भंडारण सुविधाओं को बढ़ाना शामिल है। उदाहरण के लिए, सऊदी अरब ने ‘अल-शहर्का पाइपलाइन’ परियोजना के माध्यम से तेल को परसे कानून से बाहर ले जाने का विकल्प खोजा है, जिससे होर्मुज संकीर्ण गली पर दबाव कम होता है।
संयुक्त अरब अमीरात भी ‘फुजैरा टर्मिनल’ का विस्तार करके होर्मुज जलसंधि के द्वीप से तेल निर्यात के वैकल्पिक मार्ग विकसित कर रहा है। इसके अलावा, कतर और ओमान भी समुद्री मार्गों और पाइपलाइनों के निर्माण पर भारी निवेश कर रहे हैं ताकि आपूर्ति श्रृंखला में बाधा आने पर वे जल्दी विकल्पों का उपयोग कर सकें।
इन परियोजनाओं की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे वैश्विक तेल बाजार को स्थिर रखने के लिए जरूरी हैं। होर्मुज की संकीर्णता पर कोई भी व्यवधान वैश्विक बाजार में कीमतों में अप्रत्याशित वृद्धि और आपूर्ति संकट उत्पन्न कर सकता है। इसलिए, ये बाल्कनी मार्ग, पाइपलाइन, और टर्मिनल निवेश क्षेत्र के स्थिरता एवं सुरक्षा के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि जबकि होर्मुज जलसंधि को पूरी तरह से छोड़ पाना मुश्किल है, लेकिन इन बहुपक्षीय परियोजनाओं, नई तकनीकों और आर्थिक सहयोग के बल पर खाड़ी राज्य अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर सकते हैं। भारत समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था भी इन नए जलमार्गों और संसाधनों से प्रभावित होने की संभावना है।
इस प्रकार, खाड़ी के देश दशकों के निष्क्रिय विचारों को अब व्यवहारिक रूप देकर एक प्रतिस्थापन विकसित करने की प्रक्रिया में हैं, जो न केवल क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण होगी, बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी एक मजबूत पहचान होगी।

