President Murmu approves increasing Supreme Court Judge strength from 34 to 38

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने को लेकर हाल ही में ली गई निर्णय की प्रशंसा की जा रही है। संज्ञान में आए फैसले के अनुसार, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संख्या वर्तमान 34 से बढ़ाकर 38 करने की मंजूरी दी है। यह कदम न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या को कम करने और न्याय प्रक्रिया को तेज करने के लिए उठाया गया है।

शीर्ष न्यायालय में मामलों के अत्यधिक दबाव को देखते हुए इस निर्णय को स्वागत योग्य बताया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट वकील और संविधान एवं न्यायिक मामलों के जानकार Advocate सुमित घेळोत ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “यह कदम निश्चित रूप से स्वागत योग्य है, लेकिन केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना लंबित मामलों की समस्या का पूर्ण समाधान नहीं होगा।” उन्होंने कहा कि इस दिशा में अन्य सुधार भी जरूरी हैं, जैसे कि कंपलीट केस मैनेजमेंट सिस्टम, न्यायालय के संसाधनों का बेहतर उपयोग और प्रक्रियाओं का सरलीकरण।

वकील सुमित घेळोत ने आगे कहा, “अगर हम केवल संख्या पर ही ध्यान केंद्रित करेंगे तो सवालों का त्वरित समाधान नहीं हो पाएगा। जरूरी है कि न्यायपालिका की कार्यप्रणाली में सुधार लाया जाए, ताकि न्याय को पहुंचाना तेज़ और प्रभावी बन सके। न्यायिक प्रक्रियाओं में पुनरावलोकन, तेजी से सुनवाई और डिजिटल तकनीक का प्रसार भी अत्यंत आवश्यक हैं।”

विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती जनसंख्या, बढ़ते छोटे विवाद और जटिल मामलों के चलते न्यायालयों पर बोझ बढ़ता जा रहा है। वर्ष 2023 के आंकड़ों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में लाखों मामले लंबित हैं, जिनका निष्पादन समय पर न हो पाना न्यायिक प्रणाली की एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। लोगों को न्याय दिलाने की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी, त्वरित और सुलभ बनाने के लिए यह बदलाव नितांत आवश्यक है।

इस संदर्भ में सरकार और न्यायपालिका की ओर से पहले भी कई पहल की जा चुकी हैं, जैसे कि अन्य न्यायालयों की स्थापना, मीडिएशन और वैकल्पिक विवाद समाधान के प्रयास। न्यायाधीशों की संख्या में इस वृद्धि से उम्मीद की जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट की कार्यक्षमता में सुधार आएगा और मामलों का निपटारा तेजी से होगा।

अंत में, यह फैसला देश में न्यायपालिका की स्थिरता और मजबूती का द्योतक माना जा रहा है, जो न्यायिक व्यवस्था को और मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम है। न्यायपालिका के समक्ष बढ़ती चुनौतियों का सामना करने के लिए इस तरह के निर्णय आवश्यक हैं, ताकि देश के नागरिकों को शीघ्र और न्यायसंगत न्याय मिल सके।

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