Why parents feel trapped by private schools

देश में शिक्षा प्रणाली के बदलते स्वरूप और निजी स्कूलों की बढ़ती महंगाई के कारण आज कई माता-पिता अपनी संतानों की शिक्षा को लेकर चिंतित और फंसे हुए महसूस कर रहे हैं। निजी स्कूलों का शुल्क और अन्य संबंधित खर्च परिवारों की आर्थिक दबाव को बढ़ा रहे हैं, जिससे वे अक्सर एक जाल में फंसे होने का एहसास करते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में निजी स्कूलों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। जबकि इससे गुणवत्ता और सुविधाओं में सुधार की उम्मीद थी, परन्तु बढ़ती फीस और अतिरिक्त शुल्क ने कई परिवारों के बजट पर भारी बोझ डाल दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, उच्च फीस के कारण बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना एक बड़ा चुनौती बन गया है, विशेष रूप से मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए।

माता-पिता का यह भी कहना है कि निजी स्कूलों में फीस के अलावा अन्य अनेक छिपे हुए शुल्क होते हैं, जिनमें परीक्षा शुल्क, विकास शुल्क, कोचिंग आदि शामिल हैं। कई बार ये शुल्क अचानक बढ़ा दिए जाते हैं, जिससे वे असमंजस और बेचैनी का अनुभव करते हैं। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बिना नियमन के ये शुल्क अभिभावकों के लिए भारी आर्थिक बोझ बनते जा रहे हैं।

साथ ही, कोविड-19 महामारी के बाद ऑनलाइन शिक्षा की ओर बढ़ोतरी हुई है, जिसने भी निजी स्कूलों की फीस संरचना को प्रभावित किया है। बेहतर सुविधाओं के दावे के बावजूद, कई अभिभावक ऑनलाइन शिक्षा के लिए इतनी महंगी फीस का औचित्य नहीं देखते। इससे वे अपनी आर्थिक स्थिति को लेकर असमंजस में पड़ जाते हैं, क्योंकि वे बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए कभी-कभी कर्ज या अन्य वित्तीय सहायता पर निर्भर हो जाते हैं।

सरकारी एजेंसियां अब इस विषय पर गंभीरता से विचार कर रही हैं और कुछ राज्यों में निजी स्कूलों की फीस नियंत्रण के लिए नियम बनाए जा रहे हैं। लेकिन जरूरत यही है कि शिक्षा की पहुंच हर वर्ग के लिए सुगम हो और फीस संरचना पारदर्शी एवं न्यायसंगत बनी रहे।

अंततः, शिक्षा की गुणवत्ता और आर्थिक उपलब्धता दोनों को संतुलित करना आवश्यक होगा ताकि भविष्य की पीढ़ी बेहतर अवसरों से लाभान्वित हो सके और माता-पिता को शिक्षा के मामले में आर्थिक दबाव महसूस न करना पड़े।

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