नई दिल्ली: हाल ही में स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) द्वारा जारी किया गया नवीनतम आकलन भारत की दूसरी स्ट्राइक क्षमताओं के परिपक्व होने की पुष्टि करता है। यह दर्शाता है कि भारत ने अपने लंबे समय से चले आ रहे ‘पहले प्रयोग न करने’ के सिद्धांत में कोई बदलाव नहीं किया है। देश की परमाणु नीति अब भी मुख्य रूप से बचावात्मक और प्रतिकारात्मक बनी हुई है।
इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत की दूसरी स्ट्राइक क्षमता में हुए विकास को वैश्विक स्तर पर परमाणु हथियारों के आधुनिकीकरण और कमजोर होते हथियार-नियंत्रण तंत्र के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। दुनियाभर में परमाणु शक्ति संपन्न देशों ने अपनी क्षमताओं को आधुनिक बनाने और उन्नत तकनीकों को अपनाने की प्रक्रिया तेज कर दी है।
भारत का नीतिगत रुख स्पष्ट है कि वह किसी भी परिस्थिति में अपने परमाणु हथियारों का पहला प्रयोग नहीं करेगा। इसके बावजूद, द्वितीय स्ट्राइक क्षमता को लेकर हुए सुधार यह सुनिश्चित करते हैं कि यदि भारत पर परमाणु हमला होता है, तो वह निश्चित रूप से प्रभावी जवाब दे सके। यह रणनीति न सिर्फ देश की सुरक्षा में इजाफा करती है, बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक शांति बनाए रखने में भी मददगार साबित होती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि SIPRI की यह रिपोर्ट भारत की सतर्क और संतुलित परमाणु नीति को दिखाती है, जो वैश्विक तनाव और अस्थिरता के बीच सुरक्षा की एक मजबूत दीवार के रूप में कार्य करती है। साथ ही, यह वैश्विक हथियार नियंत्रण नियंत्रण व्यवस्थाओं के क्षीण होने की चिंता भी दिखाती है।
इस संदर्भ में, भारत जैसे उदाहरणी राष्ट्र के लिए आवश्यक है कि वह न केवल अपने सुरक्षा उपायों को मजबूत करे, बल्कि निरंतर संवाद और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से वैश्विक परमाणु शमन प्रयासों को भी प्रोत्साहित करे। यह सामरिक संतुलन और स्थिरता दोनों के लिए अनिवार्य है।
कुल मिलाकर, SIPRI की ताजा रिपोर्ट भारत की परमाणु रणनीति में परिपक्वता और सतर्कता की गहन झलक प्रदान करती है, जो कि राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत की यह नीति न सिर्फ देश को बल्कि पूरे क्षेत्र की शांति और सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण स्तंभ साबित हो रही है।

