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केरल की विज्ञान नीति में हाल में बदलाव देखा गया है, जहां अब मौलिक शोध को सार्वजनिक नीति की प्राथमिकताओं में कम महत्व दिया जाने लगा है। राज्य सरकार तेजी से उन परियोजनाओं की ओर आकर्षित हो रही है जो तत्काल और स्पष्ट परिणाम दे सकें। हालांकि, इस रुख का मतलब यह नहीं कि मौलिक विज्ञान से पूरी तरह दूर हटना उचित है।

मौलिक शोध वह आधार है जिस पर दीर्घकालिक और स्थायी विकास के रास्ते बनते हैं। यह शोध नई तकनीकों, नवाचारों और भविष्य की क्षमताओं के लिए ज़मीन तैयार करता है। केरल जैसे राज्य के लिए जो अपनी अर्थव्यवस्था को बायो-इकोनॉमी की दिशा में ले जाना चाहता है, वहां मौलिक विज्ञान की उपेक्षा करने से बड़े नुकसान की संभावना रहती है।

राज्य में आज कई शोध केंद्र और विश्वविद्यालय इस स्थिति से प्रभावित हुए हैं। उनके पास आवश्यक संसाधन और वित्त पोषण न मिल पाने के कारण, वे अपनी क्षमता के अनुरूप काम नहीं कर पा रहे हैं। इससे सृजनात्मकता और नवाचार की गुंजाइश भी घट रही है, जो अंततः आर्थिक और सामाजिक प्रगति को प्रभावित कर सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकालिक लाभ के लिए जरूरी है कि सरकार मौलिक शोध के महत्व को समझे और उसे निरंतर समर्थन दें। इस दिशा में निवेश और नीति निर्धारण ऐसा होना चाहिए, जो तत्काल लाभ के साथ-साथ भविष्य की आवश्यकताओं को भी पूरा कर सके।

केरल में नीति निर्माताओं को यह सोचने की आवश्यकता है कि केवल तार्किक और शीघ्र परिणाम वाली परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, वे वैज्ञानिक शोध के मूल तत्वों को भी सशक्त करें। तभी राज्य का बायो-इकोनॉमी में सफल संक्रमण संभव होगा, जिससे रोजगार, नवाचार और समग्र विकास में सुधार होगा।

अंत में यह कहा जा सकता है कि विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में राज्य की प्रगति के लिए मौलिक शोध की भूमिका अनिवार्य है। इसे नजरअंदाज करना राज्य की दीर्घकालिक विकास योजनाओं के लिए घातक साबित हो सकता है। इसलिए, यह समय है कि केरल सरकार अपनी नीतियों में संतुलन बनाकर विज्ञान के इस महत्वपूर्ण स्तंभ को पुनः सशक्त करे।

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