नई दिल्ली। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने भारतीय स्कूलों में तीन-भाषा नीति से जुड़ी भाषा संसाधन की कमी को दूर करने के लिए एक व्यावहारिक उपाय सुझाया है। बोर्ड ने बताया कि देश के 47.3% स्कूल पहले से ही दो या उससे अधिक भारतीय भाषाओं को शिक्षण के लिए उपलब्ध करा रहे हैं, जबकि 99.9% स्कूलों में कम से कम एक भारतीय भाषा शिक्षक मौजूद है।
CBSE के अधिकारियों ने कहा है कि भाषा समस्या के समाधान के लिए सेवानिवृत्त शिक्षकों और योग्य पोस्ट ग्रेजुएट (PG) शिक्षकों का समावेश एक प्रभावशाली विकल्प हो सकता है। इससे न केवल भाषा शिक्षक की कमी पूरी होगी, बल्कि स्थानीय भाषाओं के प्रति विद्यार्थियों की रुचि भी बढ़ेगी।
भारत में तीन-भाषा नीति का उद्देश्य विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा, हिंदी तथा अंग्रेज़ी या अन्य भाषा में दक्ष बनाना है। इसके बावजूद कई क्षेत्रों में शिक्षक वर्ग की कमी के कारण इस नीति को प्रभावी ढंग से लागू करना चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। CBSE के इस कदम से उम्मीद जताई जा रही है कि भाषा शिक्षण में बेहतर गुणवत्ता आएगी।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सेवानिवृत्त शिक्षक अनुभव और ज्ञान का भंडार होते हैं, जिनका पुनः सक्रिय होना शिक्षा के लिए लाभकारी होगा। साथ ही, योग्य PG शिक्षक अपने विषय के साथ-साथ आधुनिक शिक्षण पद्धतियां भी लाएंगे, जिससे भाषा शिक्षण में नई ऊर्जा का संचार होगा।
CBSE ने राज्य शिक्षा विभागों और स्कूल प्रबंधन से भी आग्रह किया है कि वे इस पहल का समर्थन करें और स्थानीय भाषाओं के संरक्षण तथा प्रचार-प्रसार के लिए मिलकर काम करें। इससे न केवल तीन-भाषा नीति का सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेगा, बल्कि भारत की बहुभाषी संस्कृति भी संरक्षित रहेगी।
बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ”हम चाहते हैं कि भाषा शिक्षा में सभी अड़चनें दूर हों, ताकि विद्यार्थी बेहतर तरीके से भाषा सीख सकें और अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा से भी लैस हों।”
इस नई रणनीति को लागू करने के लिए CBSE जल्द ही आवश्यक दिशा-निर्देश और मॉड्यूल तैयार कर रहा है, ताकि शिक्षकों को प्रशिक्षण देकर उन्हें नई भूमिका के लिए तैयार किया जा सके।
शिक्षकों की कमी के इस मौजूदा संकट में यह कदम एक सकारात्मक पहल के रूप में देखा जा रहा है, जिससे देश के शिक्षा क्षेत्र में सुधार की दिशा में बड़ा कदम उठाया जा सकेगा।

