अशोका विश्वविद्यालय में दूसरी भारतीय वन्य जीव पारिस्थितिकी सम्मलेन संपन्न
नई दिल्ली: अशोका विश्वविद्यालय में हाल ही में दूसरी भारतीय वन्य जीव पारिस्थितिकी सम्मलेन का आयोजन किया गया, जिसमें देश भर के विश्वविद्यालयों, सरकारी एजेंसियों, गैर-सरकारी संगठनों और क्षेत्रीय केंद्रों के शोधकर्ताओं ने भाग लिया। यह सम्मेलन पारिस्थितिकी के क्षेत्र में हो रहे नवीनतम शोधों और प्रगति पर चर्चा का प्रमुख मंच था।
सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य था पारिस्थितिकी के भविष्य की दिशा निर्धारित करना, जिसमें विकासवादी इतिहास, दीर्घकालीन पर्यवेक्षण, सार्वजनिक नीति, नवीनतम तकनीक और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने विचार विमर्श किया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि भारतीय वन्य जीव और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में विज्ञान और नीति दोनों का समन्वय अत्यंत आवश्यक है।
विशेषज्ञों ने बताया कि भारत जैव विविधता के लिहाज से विश्व का एक महत्वपूर्ण केंद्र है और इसके संरक्षण के लिए दीर्घकालीन डेटा संग्रह एवं विश्लेषण की जरूरत है। इस सम्मेलन में नई तकनीकों जैसे कि ड्रोन सर्विलांस, जियो-टैगिंग और डेटा सिमुलेशन पर भी चर्चा की गई, जो संरक्षण कार्यों को अधिक प्रभावशाली बनाने में सहायक सिद्ध हो सकती हैं।
सरकारी अधिकारियों ने सार्वजनिक नीति में ज़रूरत के अनुसार बदलाव करने तथा स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने पर बल दिया। इसके साथ ही, इस क्षेत्र में छात्रों और युवा शोधकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण एवं अवसर बढ़ाने की भी मांग उठाई गई।
समापन सत्र में पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच के जुड़ाव पर भी प्रकाश डाला गया, खासकर कैसे वन्य जीव संरक्षण मानव स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। सम्मेलन ने पर्यावरण संरक्षण और समाज के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने के लिए नई राहें खोलने की प्रेरणा प्रदान की।
इस तरह का मंच भारतीय पारिस्थितिकी और जैव विविधता के संदर्भ में ज्ञान के आदान-प्रदान और शोध को गति देने में अहम भूमिका निभाता है। अगले सम्मेलन के लिए भी उत्साह और अपेक्षाएं काफी हैं, जिनका उद्देश्य भारत में पारिस्थितिकी के विकास को और गति देना है।

