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Parts of Assam were once under sea: Study
असम के कुछ हिस्से कभी समुद्र के नीचे थे: अध्ययन
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Parts of Assam were once under sea: Study

नागालैंड विश्वविद्यालय की एक टीम ने कार्बी आंगलोंग जिले में मिडिल-ईसियोकन सैडीमेंटरी चट्टानों का अध्ययन किया है, जिससे यह निष्कर्ष निकाला गया है कि असम के कुछ हिस्से पहले समुद्र के नीचे थे। इस अध्ययन ने क्षेत्र की भूगर्भीय और भू-ऐतिहासिक स्थिति को समझने में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की है।

इस शोध के दौरान, टीम ने कार्बी आंगलोंग जिले में मौजूद चट्टानों का गहराई से निरीक्षण किया और उनकी संरचना और रासायनिक गुणों का विश्लेषण किया। मिडिल-ईसियोकन काल लगभग 40 मिलियन से 48 मिलियन वर्ष पहले का था, जब पृथ्वी का भू-भाग अब के मुकाबले भिन्न था। इस अवधि में, समुद्र के विस्तार व विभिन्न टेक्टोनिक प्रक्रियाओं के कारण कई क्षेत्र जलमग्न रहे।

वैज्ञानिकों का मानना है कि असम का यह क्षेत्र उस समय समुद्र के नीचे था, जहां तलछट जमा हो रही थी और बाद में ये चट्टानें बनीं। इस निष्कर्ष से क्षेत्र के भूगर्भीय इतिहास के कई महत्वपूर्ण पहलू उजागर हुए हैं, जो न केवल वैज्ञानिक शोधों के लिए बल्कि पर्यावरणीय और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में भी मददगार होंगे।

विशेषज्ञों ने बताया कि इस प्रकार के अध्ययन क्षेत्रीय भूगर्भीय परिवर्तनों को समझने में सहायक होते हैं और भविष्य में भूकंपीय गतिविधियों तथा जल संसाधनों के प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इस शोध की रिपोर्ट आगामी भूविज्ञान जर्नल में प्रकाशित की जाएगी, जिससे अन्य वैज्ञानिक भी इस क्षेत्र की अध्ययन प्रक्रिया और खोजों से परिचित हो सकेंगे।

नागालैंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ता इस अध्ययन को एक बड़े भूगर्भीय मानचित्रण प्रयास का हिस्सा मान रहे हैं, जो पूर्वोतर भारत के भूगर्भीय इतिहास की गहरी समझ विकसित करेगा। इससे न केवल क्षेत्र की भूगर्भीय स्थिति का सटीक आकलन होगा, बल्कि भविष्य में इस क्षेत्र में सतत विकास और संरक्षण नीतियों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा।

इस रिसर्च के माध्यम से यह भी स्पष्ट हुआ कि असम के भौगोलिक परिवर्तनों में समुद्री विस्तार और सिकुड़ाव की प्रक्रियाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं। इस अध्ययन से प्राप्त जानकारी से भूगर्भीय समय में समुद्र के विस्तार की गतिशीलता पर भी नई रोशनी पड़ी है।

नागालैंड विश्वविद्यालय की इस पहल को क्षेत्रीय भूविज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो भविष्य में और भी गहराई से भूविज्ञान के विभिन्न पहलुओं को समझने में सहायक होगी।

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