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नई दिल्ली: कोयला मंत्रालय ने 2030 तक 100 मिलियन टन गैसीकरण के लक्ष्य को हासिल करने में अपनी पूरी तैयारी होने की बात कही है। मंत्रालय के अधिकारीयों का कहना है कि यह उपलब्धि भारत के ऊर्जा और उर्वरक क्षेत्र दोनों के लिए महत्वपूर्ण साबित होगी, विशेष रूप से हाल की उर्वरक कमी के बीच।

कोयला गैसीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कोयले को गैस में परिवर्तित कर ऊर्जा उत्पादन और रासायनिक पदार्थ बनाने में उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया के माध्यम से देश की ऊर्जा सुरक्षा में सुधार के साथ-साथ उर्वरक उत्पादन में भी वृद्धि संभव है, जिससे कृषि क्षेत्र को मजबूती मिलेगी।

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि कोयला गैसीकरण अभी भी व्यापक पैमाने पर लागू करने में तकनीकी और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। इन चुनौतियों में पर्यावरणीय प्रभाव, उच्च लागत, और तकनीकी जटिलताएं शामिल हैं। मंत्रालय इन बाधाओं को दूर करने के लिए अनुसंधान एवं विकास में निवेश बढ़ा रहा है।

कोयला मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “हमने पायलट प्रोजेक्ट्स को सफलतापूर्वक पूरा किया है और राष्ट्रीय गैसीकरण नीति के तहत बड़े पैमाने पर कार्यान्वयन का रोडमैप तैयार किया है। हमारा लक्ष्य 2030 तक 100 मिलियन टन गैसीकरण के स्तर को प्राप्त करना है, जिससे देश की उर्वरक समस्याओं को काफी हद तक कम किया जा सकेगा।”

विशेषज्ञ इस दिशा में सरकार के प्रयासों की सराहना कर रहे हैं, लेकिन यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि समयबद्ध कार्यान्वयन और पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित करना आवश्यक होगा। उन्होंने कहा कि कोयला गैसीकरण के साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को भी ध्यान में रखना होगा ताकि समग्र ऊर्जा संतुलन बना रहे।

भारत में उर्वरकों की कमी किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। डीएपी और अन्य नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों की उपलब्धता में कमी के कारण कृषि उत्पादन पर प्रभाव पड़ा है। कोयला गैसीकरण से निकाले गए जवाहर गैस का उपयोग अमोनिया और अन्य रासायनिक उर्वरकों के निर्माण में किया जा सकता है, जिससे इस समस्या का समाधान भी संभावित है।

सरकार की योजनाओं के बाबजूद, समीक्षकों का भी मानना है कि इस प्रक्रिया के लिए उचित इन्फ्रास्ट्रक्चर और निवेश की आवश्यकता है। साथ ही, पर्यावरणीय मानकों का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए ताकि प्रदूषण नियंत्रण सुनिश्चित हो सके।

अतः, वर्तमान में कोयला गैसीकरण एक दूर की संभावना जरूर लगती है, मगर निरंतर अनुसंधान, तकनीकी सुधार और सरकारी समर्थन से यह भारत की उर्वरक और ऊर्जा संकट का समाधान बनने की दिशा में एक उम्मीद की किरण बन सकती है।

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