नई दिल्ली। विशेषज्ञों ने कहा है कि बच्चों से गैजेट्स जबरदस्ती छीनने की बजाय उनकी स्क्रीन उपयोग की आदतों को धीरे-धीरे बदलना आवश्यक है। नए शोध और विशेषज्ञ राय में यह बात सामने आई है कि अचानक और सख्ती से स्क्रीन टाइम को कम करने से बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं।
इस विषय पर बात करते हुए बाल मनोविज्ञानी डॉ. अंजलि मेहता ने कहा, “जब बच्चे किसी चीज़ के लिए अभ्यस्त हो जाते हैं, तो अचानक उससे उनकी दूरी बनाना उन्हें तनाव और चिंता में डाल सकता है। इसीलिए, स्क्रीन टाइम की आदतों को धीरे-धीरे नियंत्रित करना ज्यादा कारगर होता है।” उन्होंने यह भी बताया कि माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के साथ संवाद कर उन्हें समझाएं कि स्क्रीन का सीमित उपयोग क्यों जरूरी है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि बच्चों को डिजिटल उपकरणों से पूरी तरह वंचित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उनकी स्क्रीन टाइम की गुणवत्ता और मात्रा पर ध्यान दिया जाना चाहिए। बच्चों को शैक्षिक और रचनात्मक सामग्री का चयन करने में मदद करनी चाहिए। इसके साथ ही परिवार और स्कूलों को भी सामूहिक रूप से इस मुद्दे पर काम करना चाहिए ताकि बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की रक्षा हो सके।
बाल विकास विशेषज्ञ डॉ. रवि शर्मा ने कहा, “स्क्रीन टाइम कम करने के लिए धीरे-धीरे छोटे छोटे ब्रेक देना और ऑफलाइन गतिविधियों को बढ़ावा देना आवश्यक है। बच्चों को खेल, पढ़ाई और सामाजिक गतिविधियों के जरिए व्यस्त रखना एक अच्छा विकल्प हो सकता है।” उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि डिजिटल डिटॉक्स के बजाय एक संतुलित जीवनशैली अपनाई जानी चाहिए।
मनोवैज्ञानिक क्लिनिकों में हाल ही में स्क्रीन एडिक्शन की शिकायतें बढ़ी हैं, जिसकी प्रमुख वजह अनियंत्रित डिजिटल डिवाइस का उपयोग बताया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सही मार्गदर्शन और सहायक वातावरण दिया जाए तो बच्चे स्क्रीन उपयोग की आदतों को सकारात्मक दिशा में बदल सकते हैं।
अंततः, विशेषज्ञ यह कह रहे हैं कि डिजिटल युग में स्क्रीन से पूरी तरह दूर रह पाना संभव नहीं है, परन्तु परिवार और समाज की समझदारी एवं संयम इसे सही दिशा में मोड़ सकती है। बच्चों की सेहत और मानसिक शांति के लिए स्क्रीन ब्रेक जरूरी हैं, लेकिन इसे स्नेह, समझ और धैर्य के साथ लागू करना होगा।

