मुगल काल की धरोहर में समाहित पारंपरिक手कारी ‘कसाब ज़री’ को जीवित रखने के प्रयास आज नई पहचान हासिल कर रहे हैं। फैशन लेबल ‘जेड बाय मोनिका और करिश्मा’ इस कला को पुनर्जीवित करते हुए एक ऐसा मास्टरपीस तैयार कर रहा है, जिसमें करीब 15,000 घंटे की मेहनत झलकती है। यह निष्पादन न केवल पारंपरिक मुगल कला का संवाहक है, बल्कि इसमें फारसी शिल्प की विरासत की भी झलक मिलने लगती है।
मोनिका शाह, जो इस ब्रांड की प्रमुख डिजाइनर हैं, का कहना है कि कसाब ज़री तकनीक की जटिलता और उसकी सांस्कृतिक गहराइयों को समझना बेहद जरूरी है। यह एक ऐसा शिल्प है, जिसमें महीनों की धैर्यपूर्ण मेहनत और कुशलता की आवश्यकता होती है। फैशन की दुनिया में इस तकनीक को पुनर्जीवित करना न केवल सांस्कृतिक संरक्षण का कार्य है बल्कि आधुनिक शैली के साथ पारंपरिक कारीगरी को जोड़ने का भी उदाहरण प्रस्तुत करता है।
जेड लेबल के तहत बने कपड़े केवल फैशन का प्रतीक नहीं हैं बल्कि वे शिल्पियों की कला, उनकी मेहनत और उस विरासत की कहानी कहते हैं जो मुगल काल की जड़ों से जुड़ी है। इस कारीगरी में इस्तेमाल होने वाली कसाब ज़री, जो मुख्यतः सुनहरी और चांदी की कढ़ाई होती है, एक बार फिर आधुनिक डिजाइन के साथ उभरी है।
फैशन विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की कारीगरी का पुनरुद्धार समय की मांग है, क्योंकि पारंपरिक कला को भूलना या उसे खो देना सांस्कृतिक क्षति के समान है। जेड के इस प्रयास से न केवल देश के अंदर बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की शिल्प कला को नई दिशा मिल रही है।
मोनिका और करिश्मा का यह संयुक्त प्रयास क्षेत्रीय कारीगरों को रोजगार देने के साथ उनकी कला को स्थायी रूप देने में भी सहायक सिद्ध हो रहा है। इस पहल से युवा पीढ़ी में भी पारंपरिक शिल्प के प्रति सम्मान और रुचि पैदा हो रही है।
संक्षेप में, ‘जेड बाय मोनिका एंड करिश्मा’ का कसाब ज़री पुनरुद्धार परियोजना केवल एक फैशन प्रदर्शनी नहीं, बल्कि एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक आंदोलन भी है, जो आधुनिक तकनीकों के साथ पारंपरिक मुगल कला को संजोए रखने का सराहनीय प्रयास है।

