असम के काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में भारत का पहला उपग्रह-टैग किया गया गंगा का सॉफ्ट-शेल कछुआ हाल ही में जारी किया गया है। इस महत्वपूर्ण कदम को वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक मील का पत्थर माना जा रहा है। रिलीज समारोह उसी दिन हुआ जब विश्वभर में संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण के लिए एंडेंजर्ड स्पीशीज डे मनाया गया।
असम के मुख्यमंत्री हेमंत विश्व शर्मा ने इस अवसर पर कहा कि यह कदम वन्यजीव संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि गंगा का सॉफ्ट-शेल कछुआ न केवल क्षेत्रीय जैव विविधता के लिए अहम है, बल्कि इसके संरक्षण से जल संरक्षण और पारिस्थितिकी तंत्र संतुलन में भी मदद मिलेगी। मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि सरकार इस प्रकार के संरक्षित प्रजातियों की रक्षा और उनकी बढ़त सुनिश्चित करने के लिए तकनीकी संसाधनों का उपयोग बढ़ा रही है।
गंगा का सॉफ्ट-शेल कछुआ एक मीठे पानी की द्विप्राणि प्रजाति है जो मुख्यत: गंगा नदी और इसके सहायक नदियों में पाई जाती है। लगातार जल प्रदूषण, आर्द्रभूमि के विनाश और शिकार की घटनाओं के कारण इसकी संख्या में भारी गिरावट आई है, और इसे संकटापन्न प्रजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। उपग्रह टैगिंग तकनीक के माध्यम से वैज्ञानिक इन कछुओं की प्रवास, आवास उपयोग और व्यवहार का अध्ययन कर पाएंगे, जिससे बेहतर संरक्षण रणनीतियाँ बन सकेंगी।
यह परियोजना एक संयुक्त प्रयास है, जिसमें वन्यजीव सर्वेक्षण भारत, असम सरकार और पर्यावरण संरक्षण संस्थान शामिल हैं। कछुए को उपग्रह से टैग करने के बाद उसे सुरक्षित रूप से नदी में छोड़ दिया गया। इस तकनीक से कछुए के इलाके की निगरानी करना और उनकी संख्या में वृद्धि के लिए आवश्यक कदम उठाना आसान होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के संरक्षण प्रयास गंगा नदी के जैविक स्वास्थ्य को पुनर्स्थापित करने में मदद करेंगे और स्थानीय समुदायों में संरक्षण जागरूकता भी बढ़ाएंगे। काजीरंगा जैसे राष्ट्रीय उद्यान में इस तरह का पहल वन्यजीव संरक्षण के लिए एक नई दिशा प्रदान करता है।
अंत में, इस तकनीकी पहल को वन्यजीव संरक्षण की दिशा में सफलता की ओर एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो देश में जैव विविधता की सुरक्षा में एक नया अध्याय शुरू करेगी। सभी पक्ष ऐसे और प्रयासों को समर्थन देने के लिए प्रतिबद्ध हैं ताकि वन्यजीवों की विविधता बनी रहे और हमारी प्राकृतिक धरोहर सुरक्षित रह सके।

