हाल ही में किए गए एक अध्ययन में यह पाया गया है कि एयर-कूल्ड कंडेंसर एरेज़, जो टरबाइन से निकलने वाली भाप को संघनित करते हैं, अपने आसपास के वातावरण का तापमान 8 से 14 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा सकते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान कंडीशनर द्वारा गर्म हवा आसपास के इलाकों में रिलीज होती है, जो तापीय धुंध के रूप में नीचे की ओर बहती है और पास के क्षेत्रों के तापमान में वृद्धि करती है।
एयर-कूल्ड कंडेंसर टरबाइन के निकास भाप को ठंडा करके उसे संघनित करते हैं ताकि ऊर्जा उत्पादन प्रक्रिया अधिक कुशल हो सके। हालांकि, इस घटक के संचालन से निकलने वाली गर्म हवा का प्रभाव समान्य से कहीं अधिक होता है। अध्ययन में बताया गया कि यह गर्म हवा आसपास के स्थानों में फैली जाती है, जिससे उन इलाकों में तापमान में वृद्धि होती है।
विशेषज्ञों ने कहा कि इस तरह की थर्मल प्लूम्स (तापीय धुंध) की उपस्थिति से न सिर्फ स्थानीय तापमान बढ़ता है, बल्कि यह पारिस्थितिक तंत्र और मानव स्वास्थ्य पर भी प्रभाव डाल सकता है। तापमान में केवल 2.2 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी से भी पेड़-पौधों के विकास, जलस्तर और वायु गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
अध्ययन के अनुसार, यह समस्या मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में अधिक गंभीर हो सकती है जो डेटा केंद्रों और बड़े पैमाने पर एयर-कूल्ड सिस्टम वाले औद्योगिक केंद्रों के नजदीक स्थित हैं। ग्रामीण एवं शहरी इलाकों में इसके पर्यावरणीय प्रभाव पर भी शोध चल रहा है।
पर्यावरणविदों ने सुझाव दिया है कि डेटा केंद्रों में इस्तेमाल होने वाले कूलिंग सिस्टम को ऊर्जा दक्षता के साथ साथ वातावरण के अनुकूल बनाने पर ध्यान देना आवश्यक है, ताकि स्थानीय तापमान में असामान्य वृद्धि को रोका जा सके। यह कदम न केवल पर्यावरण संरक्षण के लिए जरूरी है बल्कि भविष्य में ऊर्जा उत्पादन और प्रबंधन में स्थिरता लाने के लिए भी उपयोगी होगा।
यह अध्ययन इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि तेजी से बढ़ रहे डिजिटल युग में ऊर्जा के ऐसे प्रयोग जो पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं, उन पर गंभीर ध्यान देने की आवश्यकता है। डेटा केंद्रों से निकलने वाली गर्मी को नियंत्रित करने के लिए बेहतर तकनीकों और नीतियों का विकास किए बिना, आसपास के इलाकों का तापमान बढ़ने का खतरा बना रहेगा।
