नई दिल्ली। PRS अनुसंधान रिपोर्ट ने 2025 में राज्यों के विधानसभाओं द्वारा बिलों की पारित प्रक्रिया में हो रही जल्दबाजी पर गंभीर चिंता जताई है। रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष कुल 600 से अधिक राज्य विधेयक पारित किए गए, जिनमें से लगभग 30% ऐसे थे जिन्हें बिल के पेश किए जाने के दिन ही मंजूरी दी गई।
विशेष रूप से आंध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, झारखंड, मिजोरम, पुदु चेरी और पंजाब की सात विधानसभा ने विधेयकों को प्रस्तुत करने के एक ही दिन या अगले दिन पारित किया, जिससे विधायी प्रक्रिया में उचित जांच-पड़ताल के अभाव की संभावना बढ़ गई है।
PRS की यह रिपोर्ट दर्शाती है कि इस प्रकार की जल्दबाजी से न केवल विधान पारित होने की गुणवत्ता प्रभावित होती है, बल्कि इससे नियमों और कानूनी प्रावधानों की गहन समीक्षा भी प्रभावित होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायसंगत और संतुलित क़ानून निर्माण के लिए सदन में विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा और विचार-विमर्श अवश्यक है।
कई राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिये चिंताजनक संकेत माना है। उनका कहना है कि विधायी प्रक्रियाओं की जल्दबाजी से संविधान के मूल्यों और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ऐसे में जनहित की बजाए राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति हो सकती है।
राज्य सरकारों ने अपने बचाव में कहा है कि कई बार उपयुक्त तैयारी और आवश्यक सहमति मिलने के कारण तत्काल बिल पास करना जरूरी होता है। हालांकि, आलोचक कहते हैं कि इस तरह की प्रक्रिया पारदर्शिता और जवाबदेही के सिद्धांतों के खिलाफ है।
ज्ञात हो कि संसद और विधानसभाओं में पारदर्शिता तथा विधायी प्रक्रिया की गुणवत्ता को बढ़ावा देने के लिए समय-समय पर सुधार की मांग की जाती रही है। PRS रिपोर्ट की यह चेतावनी इस दिशा में गंभीर पहल करने की जरूरत को और पुष्ट करती है।
संक्षेप में 2025 का वर्ष विधायी तेजी के लिए उल्लेखनीय रहा है, लेकिन इसके साथ ही विधायी जांच और प्रक्रिया में पारदर्शिता के स्तर को बनाए रखने की चुनौतियां भी सामने आई हैं। आने वाले समय में राज्यों को इस संतुलन को ठीक करने हेतु प्रभावी कदम उठाने होंगे ताकि लोकतंत्र के स्तंभ मजबूत बने रहें।

