कर्नाटक की राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है क्योंकि नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण से पहले मंत्रिमंडल के गठन को लेकर सियासी दल सक्रिय हो गए हैं। भारतीय संविधान के तहत कर्नाटक में मंत्रिमंडल के आकार की सीमा कुल सदन के 15 प्रतिशत तक ही हो सकती है, जिसका मतलब है कि कर्नाटक में अधिकतम 35 सदस्यीय मंत्रिमंडल ही बनाया जा सकता है। यह सीमा वर्तमान में राजनीतिक दलों और मुख्यमंत्री के लिए एक महत्वपूर्ण पैरामीटर साबित हो रही है।
वर्तमान में चल रही चर्चाओं के अनुसार, राज्य में नए मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान अभी तक नहीं हुआ है, लेकिन शिवकुमार के मंत्रिमंडल में शामिल होने को लेकर सत्तारूढ़ पार्टी की अंदरूनी बयानबाजी तेज हो चुकी है। लाबींग के दौर में कई दिग्गज नेता अपने समर्थकों को मंत्रिपद दिलाने के लिए जोर-शोर से लगे हुए हैं। सूत्र बताते हैं कि इस बार मंत्रीमंडल के गठन में पक्ष व विपक्ष के ताकतवर नेताओं के बीच संतुलन बनाना राज्यपाल की प्राथमिकता होगी।
राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि कर्नाटक की सरकार में गठबंधन की मजबूती बनाए रखने के लिए मुख्यमंत्री को नए मंत्रियों के चयन में क्षेत्रीय और जातीय संवेदनाओं का भी ध्यान रखना होगा। इसके साथ ही, वर्तमान सतर्कता और भ्रष्टाचार विरोधी माहौल को ध्यान में रखते हुए मंत्रिपद पर नामित नेताओं का कद भी महत्वपूर्ण होगा।
शासन व्यवस्था की दक्षता और टीम की सामंजस्य पर भी सभी की निगाहें बनी हुई हैं क्योंकि आगामी बजट सत्र और विकास कार्यों में मंत्रिमंडल की भूमिका निर्णायक रहेगी। अधिकारी और राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर सहमत हैं कि उचित मंत्रियों के चयन से सरकार की साख और कार्यक्षमता दोनों बढ़ेगी और जनता का विश्वास भी मजबूत होगा।
कुल मिलाकर, कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बनने के साथ-साथ उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों के चयन को लेकर जारी हलचल राज्य की राजनीतिक परिदृश्य में कई नए बदलाव ला सकती है। इस प्रक्रिया को लेकर जनता, मीडिया और राजनीतिक दिग्गज सभी की नजरें टिकी हुई हैं, जो आगामी दिनों में स्पष्ट होकर सामने आएंगी।

