नई दिल्ली। एक हालिया अध्ययन में बताया गया है कि 2024 में विश्वभर में पांच वर्ष से कम उम्र के लगभग 4.9 मिलियन बच्चे अपनी जान गंवा चुके हैं। इन बच्चों की मृत्यु के प्रमुख कारणों में प्री-टर्म बर्थ कॉम्प्लिकेशंस (असामयिक जन्म जटिलताएं) और निमोनिया सबसे अधिक प्रभावित पाए गए हैं। यह विषय वैश्विक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चुनौती के रूप में सामने आया है।
अध्ययन में स्पष्ट किया गया है कि जन्म के ठीक पहले और तुरंत बाद की स्वास्थ्य समस्याएं बच्चों की मृत्यु का सबसे बड़ा कारण बनी हैं। प्री-टर्म जन्म का मतलब है कि बच्चे का जन्म निर्धारित अवधि से पहले होता है, जिससे उनके अंग पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते और उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाती है। इस वजह से, वे संक्रमणों और अन्य जटिलताओं के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।
निमोनिया, जो एक संक्रमण आधारित फेफड़ों की बीमारी है, पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में मौत के मुख्य कारणों में से एक है। अध्ययन के अनुसार, सही समय पर निदान और उपचार की कमी इन मौतों में भारी योगदान करती है। विशेष रूप से विकसित और विकासशील देशों के बीच स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच में असमानता ऐसी समस्याओं को और बढ़ावा देती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति को सुधारने के लिए गर्भावस्था के दौरान बेहतर देखभाल, समय पर टीकाकरण एवं प्रभावी पोषण शामिल है। इसके अलावा, प्रसव के बाद शिशु की देखभाल और संक्रमणों से सुरक्षा के लिए जागरूकता बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां लगातार प्रयास कर रही हैं ताकि नवजात और बच्चों की मृत्यु दर में गिरावट लाई जा सके। उन्होंने कहा है कि उपलब्ध संसाधनों का उचित उपयोग और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार बच्चों के जीवन रक्षा में निर्णायक भूमिका निभाएगा।
इस अध्ययन ने वैश्विक समुदाय के लिए एक अलार्म बजाया है कि बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य में सुधार लाना न केवल व्यक्तिगत स्तर पर, बल्कि पूरे समाज के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिससे हर बच्चा शारीरिक, मानसिक और संपूर्ण विकास के साथ सुरक्षित और स्वस्थ जीवन जी सके।

