बिहार में पटना कलम नामक 18वीं सदी की लगभग भूली-बिसरी चित्रकला कला के प्रति नई रुचि देखने को मिल रही है। इस खास कला शैली के तहत मुगल मिनिएचर पेंटिंग की सूक्ष्मता और यूरोपीय प्राकृतिक चित्रण की भव्यता का अनोखा मेल देखने को मिलता है। इस पुनरुद्धार का उद्देश्य न केवल इस अमूल्य विरासत को संजोना है, बल्कि इसे युवाओं और कला प्रेमियों के बीच पुनः लोकप्रिय बनाना भी है।
पटना कलम की शुरुआत मुगल और यूरोपीय चित्रकला तकनीकों के माध्यम से बिहार के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के विविध पहलुओं को चित्रित करने से हुई थी। यह कला शैली खास तौर पर 18वीं सदी में विकसित हुई और इसकी खासियत इसकी जीवंतता, सूक्ष्मता और रोजमर्रा की जिंदगी के सजीव चित्रण में निहित है। हालाँकि समय के साथ यह कला विधा धीरे-धीरे कम महत्वपूर्ण होती गई, लेकिन अब इसे पुनर्जीवित करने की पहल जोर-शोर से हो रही है।
वर्तमान में बिहार सरकार और अनेक सांस्कृतिक संस्थान मिलकर इस कला को बचाने व बढ़ावा देने के लिए विभिन्न कार्यशालाओं, प्रदर्शनों और प्रदर्शनियों का आयोजन कर रहे हैं। पटना के पुराने कारीगरों के साथ-साथ नई पीढ़ी के कलाकार भी इसमें रूचि ले रहे हैं, जो पुराने स्वरूप को समकालीन शैली के साथ मिलाकर उसे नई दिशा दे रहे हैं। इस पुनरुत्थान अभियान में शैक्षिक सामग्री, ऑनलाइन संसाधन और स्थानीय संग्रहालयों का भी महत्वपूर्ण योगदान है।
आधुनिक कला प्रेमी और इतिहासकार पटना कलम को न केवल एक सांस्कृतिक विरासत के तौर पर देख रहे हैं, बल्कि इसे बिहार की पहचान के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में भी मानते हैं। इसके माध्यम से प्रदेश की कला, इतिहास और सामाजिक धरोहर को दुनिया के समक्ष प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है।
पटना कलम पुनरुद्धार के महत्व को समझते हुए, कई युवा कलाकार अब इस पारंपरिक कला को डिजिटल माध्यमों में भी विकसित कर रहे हैं, जिससे इसका प्रसार और जनमानस तक पहुंच बढ़ रही है। इस प्रयास से बिहार में सांस्कृतिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है, जो आर्थिक और सामाजिक रूप से क्षेत्र के विकास में मददगार साबित होगा।
इस प्रकार, पटना कलम की पुनरावृत्ति न केवल सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक है, बल्कि यह बिहार की कला और इतिहास को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का भी एक सशक्त माध्यम बन रहा है।

