हैदराबाद से रिपोर्टर: एक समय युद्ध कौशल और लोक परंपरा के रूप में प्रसिद्ध कर्रा समु आज नई पीढ़ी के बीच फिर से जीवन पा रहा है। तेलंगाना की इस पारंपरिक डंडा-कला को अब न केवल खेल या मनोरंजन के रूप में देखा जा रहा है, बल्कि यह फिटनेस, आत्मरक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण का एक अहम हिस्सा बन चुकी है।
कर्रा समु, जो कई दशकों पहले लड़ाई के मैदानों में इस्तेमाल होती थी, धीरे-धीरे भुला दी गई थी। लेकिन हाल के वर्षों में हैदराबाद और आसपास के क्षेत्रों में इस कला के पुनरुत्थान के प्रयासों ने इसे पुनर्जीवित किया है। बच्चे और वयस्क दोनों ही इसे सीखने और अपनाने के लिए उत्साहित हैं। खासकर युवा वर्ग में इसके प्रति रुचि बढ़ी है, जो अपनी सेहत के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव महसूस करना चाहते हैं।
इस खेल की खासियत इसके सशक्त और संतुलित शारीरिक अभ्यास में है, जो शरीर के विभिन्न अंगों की मजबूती के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक दृढ़ता भी प्रदान करता है। कर्रा समु की प्रैक्टिस से न केवल शारीरिक फिटनेस बेहतर होती है, बल्कि आत्मरक्षा की क्षमता भी मजबूत होती है। इसके अलावा, योग और आधुनिक प्रशिक्षण पद्धतियों के साथ इसका संयोजन इस कला को और भी प्रभावशाली बना रहा है।
तेलंगाना के सांस्कृतिक संगठनों और स्थानीय संस्थानों ने इस परंपरा को संरक्षित करने और इसे बढ़ावा देने के लिए कई कार्यशालाएं और प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए हैं। इन आयोजनों का उद्देश्य कर्रा समु को सिर्फ एक खेल के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता देना है।
हैदराबाद के युवाओं में इस परंपरागत कला को सीखने की बढ़ती प्रवृत्ति स्पष्ट संकेत है कि वे अपनी जड़ों से जुड़ना चाहते हैं। कर्रा समु ना केवल उन्हें शारीरिक रूप से मजबूत करता है, बल्कि उन्हें आत्मविश्वास भी प्रदान करता है जो जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी सहयोगी सिद्ध होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कर्रा समु का पुनरुद्धार तेलंगाना की मजबूत सांस्कृतिक पहचान को कायम रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह न सिर्फ परंपरागत कौशलों को बढ़ावा देगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूक और गर्वित भी बनाएगा।
इस तरह कर्रा समु आज एक आधुनिक फिटनेस और आत्मरक्षा का माध्यम बनकर सामने आया है, जो तेलंगाना की लोक विरासत को संरक्षण और प्रसार दोनों प्रदान कर रहा है।

