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Why ESIC decided to directly run new hospitals: The West Bengal trigger
ईएसआईसी ने नए अस्पताल सीधे चलाने का फैसला क्यों किया: पश्चिम बंगाल की ट्रिगर
As countries urbanise, 38% of world's population will live in large cities by 2100: Study
जैसे-जैसे देश शहरीकरण की ओर बढ़ेंगे, 2100 तक दुनिया की 38% आबादी बड़े शहरों में रहेगी: अध्ययन
'Disbelief' in India camp after a failure to adapt to 'fantastic' Ireland
भारत के कैंप में ‘आश्चर्य और असमंजस’ ने लिया जन्म, ‘शानदार’ आयरलैंड के खिलाफ अनुकूलन में नाकामी
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सिर्फ 10.2% महिलाएं ही मैदान में उतरीं, 2023 में महिला विधेयक पारित होने के बाद 20 विधानसभा चुनावों में: रिपोर्ट
Through The Magnificent Life, artist Rajesh RV imagines a world of harmony and hope
महान जीवन के माध्यम से, कलाकार राजेश आरवी ने सौहार्द और उम्मीद की दुनिया की कल्पना की
Ancient Aaykkudi Temple Discovered in Vizhinjam | Kerala Temple History
विजीनजं में प्राचीन अय्यकुडी मंदिर की खोज | केरल मंदिर इतिहास
It’s a bad idea to scratch bug bites, research says
कीट के काटने पर खुजलाना एक गलत कदम है, शोध में बताया गया
What decides your height?
क्या निर्धारित करता है आपकी ऊंचाई
Why is pregnancy sickness drug not easily accessible to all?
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बेंगलूरु, भारत – भारतीय शिल्पकला की विविधता और समृद्धि को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने के लिए स्थानीय महिला कारीगरों को सशक्त बनाने का एक महत्त्वपूर्ण प्रयास तेजी से उभर रहा है। ग्लोबल नॉन-प्रॉफिट संगठन, इबू मूवमेंट ने हाल ही में अपनी कलाकार इनक्यूबेटर पहल के तहत चार भारतीय ब्रांडों को चुना है, जिनमें बेंगलूरु का कालामकारी, महाराष्ट्र का हिमरू, और पश्चिम बंगाल का कांथा शामिल हैं। यह कदम महिला कारीगरों को डिज़ाइन में मार्गदर्शन, व्यापार प्रशिक्षण तथा वैश्विक बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराकर उनकी प्रतिभा और उत्पादों को नए आयाम देने का कार्य कर रहा है।

इबू मूवमेंट की यह पहल विशेष रूप से उन महिलाओं को केंद्रित करती है जो पारंपरिक शिल्पकला को आधुनिक वैश्विक मांगों के अनुरूप अनुकूलित कर अपनी जीविका सुधार रही हैं। इस आयोजन के जरिए उन्हें डिजाइन निपुणता, विपणन कौशल, संचालन एवं वित्तीय प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण पक्षों पर प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रमुख कारीगरों के सहयोग से कारीगरी में नवीनता लाने के साथ-साथ उनके उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के अनुरूप तैयार करना इसकी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है।

कालामकारी जिसे मुख्य रूप से बेंगलूरु क्षेत्र में विकसित किया गया है, रेशमी कपड़ों पर सुंदर पारंपरिक चित्रकारी के लिए जाना जाता है। हिमरू, महाराष्ट्र की विरासत में समृद्धता और भव्यता के साथ फैब्रिक डिज़ाइन का प्रतीक है, जबकि कांथा, पश्चिम बंगाल की ग्रामीण महिलाओं द्वारा सिला गया पारंपरिक कढ़ाई का रूप है, जो आंतरिक सजावट और परिधान दोनों के लिए लोकप्रिय है। ये शिल्प न केवल सांस्कृतिक महत्व रखते हैं बल्कि रोजगार सृजन के माध्यम से ग्रामीण और अर्धशहरी महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता भी प्रदान करते हैं।

इबू मूवमेंट के प्रतिनिधि ने बताया, “हम चाहते हैं कि ये पारंपरिक कला रूप आधुनिक बाजारों में प्रतिस्पर्धी बने, जिससे कारीगरों का आर्थिक सशक्तिकरण हो। हमारी टीम उनकी आवश्यकताओं को समझकर व्यावसायिक सहयोग, डिज़ाइन नवाचार और वैश्विक ब्रांडिंग पर विशेष ध्यान देती है।”

इस पहल से जुड़ी महिला उद्यमी भी अपनी प्रतिक्रिया में उत्साहवर्धक बातें साझा कर रही हैं। एक कारीगर ने कहा, “पहले उत्पादों को सही बाजार तक पहुंचाना हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। अब, प्रशिक्षण और मार्गदर्शन के चलते हम वैश्विक स्तर पर अपनी कला का प्रदर्शन कर पा रही हैं।”

समाप्त करते हुए, यह कहा जा सकता है कि इबू मूवमेंट की इस पहल से न केवल भारतीय हस्तशिल्प कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल रही है, बल्कि महिला कलाकृतियों को आर्थिक रूप से मजबूत करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम उठाया जा रहा है। यह महिला सशक्तिकरण और सांस्कृतिक संरक्षण का समन्वय है, जो भविष्य में और अधिक सफलताओं के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा।

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