नई दिल्ली: हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है, जिसमें कोचिंग संस्थानों के अनियंत्रित और फीस-आधारित व्यापार को खत्म करने की मांग की गई है। इस याचिका में अदालत से आग्रह किया गया है कि वे संबंधित अधिकारियों को निर्देश दें ताकि वे इस समानांतर शिक्षा व्यवस्था को नष्ट कर सकें जो राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षाओं के पाठ्यक्रम और परीक्षा पैटर्न को राज्य सरकार द्वारा निर्धारित स्कूल पाठ्यक्रम के अनुरूप कराने में विफल है।
याचिका में कहा गया है कि वर्तमान में एक व्यापक, अनियमित और महंगा कोचिंग उद्योग विकसित हो गया है जो शिक्षा के क्षेत्र में भारी भ्रष्टाचार को जन्म दे रहा है। यह व्यवस्था छात्रों को अधिक तनाव और आर्थिक बोझ में डाल रही है, जबकि उनकी वास्तविक शैक्षिक योग्यता पर विपरीत प्रभाव डालती है। इस उद्योग का विस्तार ‘डमी स्कूल’ नामक नकली संस्थानों के जरिए भी हो रहा है, जो केवल नाम मात्र के विद्यालय हैं और छात्रों को प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए महंगे कोचिंग क्लासें प्रदान करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट से यह भी अनुरोध किया गया है कि वे राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षाओं के पाठ्यक्रम और परीक्षाओं के ढांचे को स्कूल स्तर पर लागू होने वाले पाठ्यक्रम के साथ पूरी तरह से समन्वयित करने के निर्देश दें, ताकि छात्रों को समान अवसर मिल सकें और शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता बनी रहे। याचिकाकर्ता का मानना है कि ऐसा करने से कोचिंग संस्थानों के महत्व में कमी आएगी और छात्र केवल अपनी विद्यालय शिक्षा पर अधिक ध्यान केंद्रित कर पाएंगे।
इस याचिका का उद्देश्य मुख्य रूप से एक समान और न्यायसंगत शिक्षा प्रणाली तैयार करना है, जहां आर्थिक संसाधन या बाहरी दबाव छात्रों के अकादमिक भविष्य को प्रभावित न करें। साथ ही, इससे शिक्षा की गुणवत्ता में वृद्धि होगी तथा आर्थिक रूप से कमजोर छात्र वर्ग को भी मुख्यधारा में आने का अवसर मिलेगा।
हालांकि, कोचिंग संस्थानों ने इस याचिका पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं दी हैं। कुछ का कहना है कि कोचिंग ठोसाय संरचनात्मक खामियों का परिणाम है और इसे पूरी तरह समाप्त करना कठिन होगा, जबकि अन्य का मानना है कि सरकार को शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।
वर्तमान में, देश भर में लाखों छात्र राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे हैं। ऐसे में यह मामला शिक्षा व्यवस्था और कोचिंग उद्योग की भूमिका को लेकर गहन बहस और सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई इस विषय पर निर्णायक भूमिका निभाएगी।

