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किम्बर्ले ने अपने खास मेहमान, चार्टर्ड साइकोलॉजिस्ट डॉ. एली बाकले से बातचीत के दौरान यह प्रश्न उठाया कि अंतःसांवेगिक अधिभार (सेंसरी ओवरलोड) क्यों होता है। डॉ. बाकले ने बताया कि हमारे दिमाग में अनगिनत संवेदनाओं की नियमित प्रवाह होती है, जिसे हम सामान्यतः सहज रूप से संभाल लेते हैं। लेकिन जब बाहरी वातावरण में अत्यधिक आवाज़, रोशनी या अन्य उत्तेजनाएं एक साथ आती हैं, तो यह हमारे तंत्रिका तंत्र पर बोझ बन जाती हैं।

डॉ. बाकले के अनुसार, सेंसरी ओवरलोड मुख्य रूप से तब होता है जब मस्तिष्क को नियंत्रित करने वाली प्रणाली उन सभी संवेदनाओं को समान रूप से संसाधित नहीं कर पाती हैं। यह स्थिति तुरंत तनाव, बेचैनी और कभी-कभी चिंता की भावना को जन्म देती है।

उन्होंने यह भी बताया कि हर व्यक्ति की उत्तेजनाओं को सहन करने की सीमा अलग होती है। कुछ लोग विशेष रूप से संवेदनशील माने जाते हैं, जिन्हें ऐसे अत्यधिक वातावरण में स्वयं को संभालना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसके अतिरिक्त, ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर या ADHD से पीड़ित लोगों में यह स्थिति और भी अधिक गहरा अनुभव की जाती है।

डॉ. बाकले ने यह सुझाव भी दिया कि अधिभार से बचने के लिए व्यक्ति को अपने आसपास के वातावरण को जानने और आवश्यकता अनुसार सीमित करने की कोशिश करनी चाहिए। उदाहरण के लिए, वे कहते हैं कि शांत स्थानों में रहना, मोबाइल फोन और अन्य उपकरणों से विराम लेना, और गहरी सांस लेने जैसी तकनीकों का प्रयोग मददगार साबित होता है।

मनोवैज्ञानिक ने यह भी बताया कि तकनीकी विकास के साथ हमारी जीवनशैली में आए बदलावों ने सेंसरी ओवरलोड को और बढ़ावा दिया है। स्वतंत्र रूप से काम करने वाले लोगों को लगातार नए डाटा और सूचना के सम्मुख रहना पड़ता है, जो मानसिक थकान का कारण बनता है।

किम्बर्ले की इस चर्चा ने इस महत्वपूर्ण मानसिक स्वास्थ्य मुद्दे पर समुदाय के बीच जागरूकता बढ़ाई है, जिससे लोग अपने अनुभवों को पहचान कर बेहतर जीवनशैली अपनाने की ओर प्रेरित हो सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि समाज में इस तरह की चर्चाएं बढ़ीं तो अधिभार के प्रभावों को कम करने में बड़ी सहायता मिलेगी।

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