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One body, multiple pathways: where India is going wrong in regulating pesticide exposure
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नई दिल्ली: भारत में कीटनाशकों के संपर्क से होने वाले खतरे को लेकर सुरक्षा मानकों को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। देश में खाद्य पदार्थ, पानी और हवा के माध्यम से कीटनाशक पदार्थों के प्रवेश को अलग-अलग तरीके से नियंत्रित किया जाता है। हर माध्यम के लिए अलग-अलग कानून और सीमा निर्धारित की गई हैं, लेकिन यह देखने वाली बात है कि जब ये तीनों माध्यम एक ही व्यक्ति तक कीटनाशक ले जाएं तो उसका क्या प्रभाव होता है। इस पहलू पर वर्तमान में कोई समग्र नीति या अध्ययन ध्यान से नहीं किया जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय नियामक प्रथाएं, जो कीटनाशकों की सीमा तय करती हैं, उनमें इस पूरे परिदृश्य को समेटने की कमी है। खाद्य सुरक्षा मानकों के तहत हर खाद्य पदार्थ में कीटनाशक अवशेष सीमित होते हैं, पानी की गुणवत्ता के नियम अलग हैं और वायु प्रदूषण नियंत्रण में भी इन रसायनों की मात्रा के लिए सीमा निर्धारित है। लेकिन इन तीनों के संयोजन— जो असल में मानव शरीर पर समग्र प्रभाव डालते हैं— की पर्याप्त जांच और मानकीकरण अभी तक नहीं हुआ है।

अनुवांशिकी और पर्यावरणीय स्वास्थ्य के विशेषज्ञ बताते हैं कि जब एक व्यक्ति एक ही दिन में विभिन्न माध्यमों से एक जैसे कीटनाशक पदार्थ ग्रहण करता है, तो इसके स्वास्थ्य प्रभावों का समग्र आकलन करना आवश्यक है। कई बार छोटी-छोटी मात्राएं जो अलग-अलग माध्यमों से ली जाएं, मिलकर गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकती हैं। यह बात भारत में कीटनाशक नियमन के सेक्टरल दृष्टिकोण की कमजोरी को दर्शाती है।

सरकारी नीति निर्धारक और पर्यावरण मंत्रालय की ओर से अब इस मामले पर ध्यान देना आवश्यक माना जा रहा है। एक संयुक्त समग्र मानक विकसित करने की पहल अंततः उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण साबित होगी। विशेषज्ञों का सुझाव है कि खाद्य सुरक्षा, जल और वायु प्रदूषण नियंत्रण के नियमों को एकीकृत मॉडल में तैयार करके जोखिम मूल्यांकन किया जाना चाहिए। इसके अभाव में चूंकि कीटनाशकों के प्रभावों की गणना सीमित होगी, इसलिए सुरक्षा मानक अधूरे रहेंगे।

देश में कृषि के लिए कीटनाशकों के व्यापक प्रयोग को ध्यान में रखते हुए इस विषय की गंभीरता को समझते हुए वैज्ञानिक एवं पर्यावरणीय संस्थान इस दिशा में विस्तृत शोध कर रहे हैं, ताकि नीति निर्माताओं को सटीक और विश्वसनीय डेटा उपलब्ध हो सके। किसानों को भी सुरक्षित और नियंत्रणित कीटनाशक उपयोग के प्रति जागरूक करना जरूरी होगा।

संक्षेप में कहा जाए तो भारत में कीटनाशक संपर्क नियंत्रण की वर्तमान व्यवस्था एक सीमित और टुकड़ों में विभाजित संरचना पर आधारित है, जो आधुनिक पर्यावरणीय स्वास्थ्य चुनौतियों को समुचित रूप से संबोधित नहीं कर पाती। जब तक हम खाद्य, जल और वायु के माध्यम से समग्र और सर्वांगीण जोखिम को न समझेंगे और उसके अनुसार नीतियां नहीं बनाएंगे, तब तक लोगों का स्वास्थ्य जोखिम में बना रहेगा।

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