देश में पानी की गुणवत्ता को सुधारने और प्रदूषण को कम करने के लिए वैज्ञानिक लगातार नए उपाय खोज रहे हैं। इसी क्रम में, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) गुवाहाटी की एक टीम ने एक महत्वपूर्ण खोज की है। शोधकर्ताओं का कहना है कि नीला-हरा शैवाल (blue-green algae) का उपयोग कर पानी में मौजूद जहरीले सीसे (lead) को प्रभावी रूप से हटाया जा सकता है। यह जैविक पदार्थ एक टिकाऊ और पर्यावरण-मित्र तरीका है, जो देश में सीसा प्रदूषित पानी की समस्या से निपटने में सहायक साबित होगा।
शोध टीम ने बताया कि जल प्रदूषण, और विशेष रूप से भारी धातुओं का पानी में मिलना एक गंभीर समस्या है जो मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। सीसा जैसी भारी धातुएं तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकती हैं और लंबी अवधि में गंभीर बीमारियों का कारण बनती हैं। हालांकि, वर्तमान में उपलब्ध कई जल शोधन तकनीकें महंगी या पर्यावरण के लिहाज से सुरक्षित नहीं हैं। इस संदर्भ में IIT गुवाहाटी की यह खोज विशेष महत्व रखती है।
टीम के प्रमुख शोधकर्ता ने बताया, “हमने नीला-हरे शैवाल का प्राकृतिक गुणों का उपयोग करते हुए एक जैविक अवशोषक विकसित किया है, जो जल में मौजूद सीसे को प्रभावशाली रूप से अवशोषित और हटाने में सक्षम है। इस प्रक्रिया में न तो महंगे रासायनिक तत्वों की जरूरत होती है और न ही कोई हानिकारक उप-उत्पाद निकलते हैं।”
शोधकर्ताओं का कहना है कि इस तकनीक से न केवल शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में प्रदूषित जल स्रोतों को स्वच्छ किया जा सकेगा, बल्कि यह उपाय अधिक टिकाऊ और सस्ते विकल्प के रूप में भी उभरेगा। साथ ही, यह जैविक तरीका प्राकृतिक संसाधनों को बचाने में भी मददगार साबित होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे देश में जल सुरक्षा को मजबूती मिलेगी और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक प्रभावी समाधान उपलब्ध होगा। भविष्य में इस शोध को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए और अधिक परीक्षण तथा विकास कार्य किए जाएंगे। IIT गुवाहाटी की यह पहल विज्ञान एवं पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक नई दिशा प्रशस्त करती है।
देश भर में प्रदूषित जल संकट को देखते हुए इस प्रकार की संवहनी और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों को अपनाना अत्यंत आवश्यक है। उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही इस शोध को व्यावसायिक स्तर पर लागू किया जाएगा और इससे लाखों लोगों को साफ और सुरक्षित पानी मिलेगा।

