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Why ESIC decided to directly run new hospitals: The West Bengal trigger
ईएसआईसी ने नए अस्पताल सीधे चलाने का फैसला क्यों किया: पश्चिम बंगाल की ट्रिगर
As countries urbanise, 38% of world's population will live in large cities by 2100: Study
जैसे-जैसे देश शहरीकरण की ओर बढ़ेंगे, 2100 तक दुनिया की 38% आबादी बड़े शहरों में रहेगी: अध्ययन
'Disbelief' in India camp after a failure to adapt to 'fantastic' Ireland
भारत के कैंप में ‘आश्चर्य और असमंजस’ ने लिया जन्म, ‘शानदार’ आयरलैंड के खिलाफ अनुकूलन में नाकामी
Only 10.2% women fielded in 20 Assembly polls since passage of women’s Bill in 2023: report
सिर्फ 10.2% महिलाएं ही मैदान में उतरीं, 2023 में महिला विधेयक पारित होने के बाद 20 विधानसभा चुनावों में: रिपोर्ट
Through The Magnificent Life, artist Rajesh RV imagines a world of harmony and hope
महान जीवन के माध्यम से, कलाकार राजेश आरवी ने सौहार्द और उम्मीद की दुनिया की कल्पना की
Ancient Aaykkudi Temple Discovered in Vizhinjam | Kerala Temple History
विजीनजं में प्राचीन अय्यकुडी मंदिर की खोज | केरल मंदिर इतिहास
It’s a bad idea to scratch bug bites, research says
कीट के काटने पर खुजलाना एक गलत कदम है, शोध में बताया गया
What decides your height?
क्या निर्धारित करता है आपकी ऊंचाई
Why is pregnancy sickness drug not easily accessible to all?
गर्भावस्था के दौरान बीमारी की दवा सभी के लिए उपलब्ध क्यों नहीं है
Jharia coal fires may burn hotter, emit more greenhouse gases than thought

झारिया, भारत के झारखंड राज्य का प्रमुख कोयला खदान क्षेत्र, लंबे समय से चल रही अनियंत्रित कोयला आगों के कारण चिंता का विषय बना हुआ है। जहाँ औद्योगिक उत्सर्जन पर कड़ाई से निगरानी रखी जाती है, वहीं झारिया जैसी जगहों से निकलने वाली गुप्त गैसें अक्सर वैश्विक ग्रीनहाउस गैस ऑडिट की निगरानी से बाहर रह जाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इन आगों से निकलने वाली तापमान और उत्सर्जित गैसें पहले की तुलना में कहीं अधिक हैं और ये पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती हैं।

झारिया कोयला क्षेत्र में कोयला भंडार के अंदर शुरू हुई आगें दशकों से जल रही हैं। ये आगें सतह के नीचे गहरे बनी रहती हैं और धुआं, कार्बन डाइऑक्साइड, मिथेन जैसे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करती हैं। हालांकि औद्योगिक इकाइयों के प्रदूषण नियंत्रण हेतु काफी प्रयास किए जाते हैं, जैसी निरंतर मॉनिटरिंग होती है, वैसे ही इस प्रकार की अनियंत्रित आगों पर गंभीर नियंत्रण नहीं है। इससे ये आगें पर्यावरण व जलवायु परिवर्तन के लिए एक छुपा हुआ खतरा बन गई हैं।

वैज्ञानिक इस बात पर चेतावनी दे रहे हैं कि जब तक इन आगों को नियंत्रित कर उचित कदम नहीं उठाए जाएंगे, झारिया क्षेत्र से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसें वैश्विक उत्सर्जन के आंकड़ों को और बढ़ा सकती हैं। शोध से पता चला है कि यह क्षेत्र उद्योगों द्वारा उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसों के मुकाबले कहीं ज्यादा मात्रा में कार्बन और मीथेन उत्सर्जित कर रहा है। ऐसे में झारिया कोयला आगों पर विशेष नियंत्रण नीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक हो गया है।

सरकार ने इस समस्या के समाधान हेतु कई बार प्रयास किए हैं, जिनमें आग बुझाने की तकनीकियों का उपयोग, खदानों का पुनर्गठन और स्थानीय लोगों को जागरूक करना शामिल है। बावजूद इसके, जलते रह गए कोयले के कारण प्रदूषण में कमी नहीं आई। विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में नई तकनीकों और व्यापक निगरानी के बिना स्थिति सुधारना मुश्किल है।

विश्व स्तर पर जलवायु परिवर्तन के खतरे को देखते हुए ऐसे अनियंत्रित उत्सर्जनों पर ध्यान देना बेहद आवश्यक है। यही वजह है कि शोधकर्ता और पर्यावरणविद झारिया कोयला आगों को गंभीर विषय मानकर वैश्विक मंच पर इसकी सूचना दे रहे हैं ताकि आवश्यक संसाधन और तकनीकी सहायता प्रदान की जा सके। वास्तव में, झारिया कोयला आगें ना केवल स्थानीय लोगों की स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ा रही हैं, बल्कि वैश्विक तापमान वृद्धि में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

अतः झारिया कोयला आगों के नियमन और उनके पर्यावरणीय प्रभाव को समझना तथा उचित समाधान निकालना न सिर्फ भारत, बल्कि पूरे विश्व की जिम्मेदारी बनती जा रही है। इसके लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, सरकारी पहल और अंतरराष्ट्रीय सहयोग अनिवार्य होगा ताकि इन खतरनाक आगों को रोका जा सके और जलवायु परिवर्तन के खतरों को कम किया जा सके।

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