नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा ईथेनॉल आवंटन प्रक्रिया को पुनः खोलने के निर्देश पर स्थिति को यथावत रखने का आदेश दिया है। इस मामले में अटॉर्नी जनरल द्वारा यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि इस स्तर पर एक आपूर्तिकर्ता के आवंटन को बढ़ाना समान स्थिति में अन्य आपूर्तिकर्ताओं से समान दावे उत्पन्न करेगा, जिससे पूरी आवंटन प्रक्रिया बाधित हो सकती है।
अटॉर्नी जनरल ने कहा कि यदि किसी एक सप्लायर को अतिरिक्त आवंटन दिया जाता है, तो समान रूप से अन्य सप्लायर भी इसी तरह के दावे करेंगे, जो खरीद प्रक्रिया की निष्पक्षता और समयबद्धता में बाधा डाल सकता है। उन्होंने बताया कि इसके चलते सरकार की ईंधन आपूर्ति और ऊर्जा सुरक्षा रणनीति प्रभावित हो सकती है।
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने ईथेनॉल आवंटन प्रक्रिया में अनियमितताओं को लेकर जांच के आदेश दिए थे, जिसके जवाब में सर्वोच्च न्यायालय ने स्थिति को तत्काल प्रभाव से स्थिर रखने का संज्ञान लिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आवंटन प्रक्रिया को खोले बिना पहले केस की सामग्री और प्रस्तुति को संभालना उचित होगा।
यह मामला महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि भारत सरकार के तहत ईथेनॉल का उत्पादन और वितरण ऊर्जा क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभाता है। ईंधन मिश्रण नीति के तहत ईथेनॉल के महत्व को देखते हुए सरकार आवंटन प्रक्रिया को पारदर्शी और न्यायसंगत बनाना चाहती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर आवंटन प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की असमानता या पक्षपात पाया जाता है तो इससे बाज़ार में अनिश्चितता और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान आ सकता है। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय इस दिशा में संतुलन बनाए रखने का प्रयास प्रतीत होता है।
वर्तमान में, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी नए आवंटन या संशोधन के लिए उपयुक्त समय और स्थान पर ही निर्णय लिया जाएगा ताकि समान स्थिति में सभी सप्लायरों के अधिकारों का सम्मान हो सके।
सरकार ने भी इस मामले में निष्पक्ष और पूर्ण जांच के लिए आश्वासन दिया है ताकि ईंधन आपूर्ति की निर्बाध व्यवस्था बनी रहे तथा सभी संबंधित पक्षों के हितों की सुरक्षा हो सके।
इस प्रकार, ईथेनॉल आवंटन प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश न केवल न्यायिक प्रक्रियाओं की गरिमा को बनाए रखता है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी स्थिरता प्रदान करता है।

