नई दिल्ली: शिक्षाविदों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) को शिक्षा के क्षेत्र में शामिल करने पर चर्चा तेज हो रही है। खासतौर पर अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या केवल कक्षा तक ही सीमित न रहकर परीक्षा हलों में भी एआई के उपयोग की इजाजत दी जानी चाहिए।
पिछले कुछ वर्षों में, कक्षाओं में एआई आधारित उपकरणों का उपयोग बढ़ा है, जिससे शिक्षक पढ़ाई के तरीके में सुधार कर पा रहे हैं। हालांकि, परीक्षा के समय एआई के इस्तेमाल को लेकर विपक्ष और समर्थक दोनों के बीच विवाद है। समर्थक कहते हैं कि एआई से छात्र अपनी प्रस्तुति बेहतर कर सकते हैं और निष्पक्ष मूल्यांकन सुनिश्चित हो सकता है। जबकि विरोधी इस बात पर जोर देते हैं कि इससे धोखाधड़ी के अवसर बढ़ सकते हैं और परीक्षा की पारदर्शिता प्रभावित हो सकती है।
शिक्षा विशेषज्ञ डॉ. सीमा वर्मा बताती हैं, “परीक्षा हलों में एआई के उपयोग से छात्र की वास्तविक योग्यता का आकलन प्रभावित हो सकता है। इसलिए इस मामले में सहमति और नियम बनाना जरूरी है।” वहीं टेक्नोलॉजी इंटिग्रेशन के समर्थक राहुल सिंह ने कहा, “एआई ऐसे टूल्स में परिवर्तित हो सकता है जो छात्रों को तुरंत सहारा देते हैं, जिससे उनकी सीखने की प्रक्रिया मजबूत होती है।”
सरकार और शिक्षा बोर्ड भी इस मुद्दे पर नजर बनाए हुए हैं। उन्होंने कुछ स्थानों पर पायलट प्रोजेक्ट के तहत एआई का उपयोग करने की योजना बनाई है, जिससे इसके प्रभावों का अध्ययन किया जा सके। इसके अलावा, डेटा सुरक्षा और गोपनीयता को लेकर भी कठोर दिशानिर्देश बनाए जाने जरूरी बताए जा रहे हैं।
इस चुनौतीपूर्ण विषय पर विशेषज्ञों का कहना है कि एआई को केवल उपकरण के रूप में देखना चाहिए, न कि परीक्षा में प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करने वाले कारक के रूप में। अंतिम निर्णय छात्रों, शिक्षकों और तकनीकी सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखकर ही लेना चाहिए।
जैसे-जैसे तकनीक आगे बढ़ रही है, शिक्षा जगत में एआई के उपयोग के नए आयाम खुल रहे हैं। लेकिन इसके साथ-साथ नैतिकता और न्याय संगत मूल्यांकन को सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक होगा।

