नई दिल्ली। हिंदू धर्म में भगवान हनुमान का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। भगवान हनुमान को शक्ति, भक्ति एवं समर्पण का प्रतीक माना जाता है। दक्षिण भारत की अनेक भाषाओं में हनुमान भक्ति गीतों का विशेष स्थान है। आज हम एक विशेष कीर्तन अर्थात भजन का उल्लेख कर रहे हैं जो मलयालम भाषा में है और जिसे हनुमान स्वरूप की महत्ता को समर्पित किया गया है।
इस कीर्तन में भगवान हनुमान के अनेक रूपों, गुणों और शक्तियों का वर्णन किया गया है। इसमें उनके दिव्य व्यक्तित्व और भक्तों के रक्षक होने के भाव को बड़ी ही सुंदरता से प्रस्तुत किया गया है। कीर्तन में कहा गया है, ‘नमो आंजनियम नमो दिव्याकायम नमो वायु पुत्रं’ इत्यादि मंत्रों के माध्यम से उनकी महिमा का गुणगान किया गया है। यह कीर्तन न केवल भक्ति को जागृत करता है बल्कि मंत्रों के सुमधुर संयोग से मानसिक शांति और ऊर्जा का संचार भी करता है।
हनुमान स्वामी की आराधना में यह कीर्तन अत्यंत लोकप्रिय है। मलयालम भाषा में इसकी रचना ने इसे दक्षिण भारतीय भक्तिमय समाज में विशेष स्थान दिलाया है। मंदिरों, भजनों की सभाओं और धार्मिक आयोजनों में यह कीर्तन बार-बार प्रस्तुत किया जाता है और श्रद्धालुओं द्वारा बड़ी श्रद्धा से सुना जाता है।
धार्मिक एवं सांस्कृतिक विशेषज्ञों के अनुसार, इस कीर्तन के शब्द भगवान हनुमान के विभिन्न रुपों जैसे कि सूर्यमित्र, वज्रकाय, ब्रह्मतेज, मारुतिं आदि का सुंदर चित्रण करते हैं, जो उनकी शक्ति, तेजस्विता और भक्तों के प्रति उनकी करुणा को उजागर करता है। उपस्थित भक्तों का कहना है कि इस कीर्तन का स्थायी प्रभाव उनके मन में सकारात्मक ऊर्जा और विश्वास जगाता है।
हनुमानजी के प्रति इस प्रकार की भक्ति गीतों का प्रचार-प्रसार पूरे देश में हो रहा है और यह हिन्दू धार्मिक संस्कृति के संरक्षण तथा संवर्धन में मददगार साबित हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे कीर्तन युवाओं को धर्म की ओर आकर्षित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
इसकीर्तन की महत्ता केवल शब्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी रसात्मक प्रस्तुति भी दर्शनीय है। इसका संगीत और छंद भक्तों के हृदय को छू जाते हैं और इसे सुनने वाले एक दिव्यता का अनुभव करते हैं। आगामी धार्मिक उत्सवों में इस प्रकार के कीर्तन का आयोजन बढ़ाने की योजना भी कई संस्थाओं द्वारा बनाई जा रही है।
अतः हनुमान स्वामी कीर्तन की इस मलयालम रचना को हिंदू धार्मिक परंपरा का एक अमूल्य हिस्सा माना जाना चाहिए। यह न केवल धार्मिक श्रद्धा को प्रबल करता है, अपितु आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में भी एक सशक्त स्तम्भ के रूप में कार्य करता है।
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