नई दिल्ली। शैक्षिक माहौल में छात्रों को सही तरीके से मार्गदर्शन करना बेहद जरूरी है ताकि वे अपने लक्ष्यों को प्रभावी ढंग से प्राप्त कर सकें। हाल ही में हुए अध्ययनों और शिक्षकों की राय के आधार पर यह स्पष्ट हुआ है कि छात्रों को अपमानित करने के बजाय उन्हें प्रोत्साहित करना अधिक प्रभावशाली तरीका है।
शिक्षकों एवं विशेषज्ञों का मानना है कि जब छात्रों को सुधारा जाता है तो उनके आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को खतरा होता है, जिससे उनकी सीखने की क्षमता प्रभावित होती है। इसके विपरीत, यदि उन्हें चुनौतियाँ दी जाएं और उनकी क्षमताओं को निखारने के लिए प्रेरित किया जाए, तो वे बेहतर प्रदर्शन करते हैं।
एक वरिष्ठ शिक्षा विशेषज्ञ कहती हैं, “छात्र तब बेहतर सीखते हैं जब उन्हें सकारात्मक माहौल मिलता है जहां उनकी गलतियों को समझदारी से सुधार किया जाता है। अपमान से उन्हें ठेस पहुँचती है, जो उनकी मानसिक सेहत पर भी विपरीत प्रभाव डालती है।”
शैक्षिक संस्थान अब यह समझने लगे हैं कि सख्त और नकारात्मक आलोचना के मुकाबले प्रेरक और सम्मानजनक व्यवहार ज्यादा कारगर होता है। उदाहरण के तौर पर, कुछ स्कूलों ने ‘सकारात्मक पुनःप्रतिक्रिया’ को अपनाया है, जहां टिप्पणी हमेशा सुधारात्मक और सहायक होती है।
विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि बच्चों के व्यक्तित्व का विकास तभी संभव है जब उन्हें यह विश्वास हो कि उनकी गलतियों को लेकर वे नकारात्मक नहीं होंगे। इस विश्वास के साथ उन्हें नई चुनौतियों का सामना करने और अपनी योग्यता को साबित करने का मौका मिलता है।
शिक्षकों को चाहिए कि वे अपने शिक्षण तरीकों में सुधार करें और छात्रों को सम्मान और प्रोत्साहन के साथ आगे बढ़ाएं। ताकि हमारा भविष्य बेहतर और सशक्त छात्राओं का निर्माण कर सके।

