नई दिल्ली। कोविड-19 महामारी के दौरान सरकार द्वारा व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों (पीपीई) की योजना और खरीदारी में हुई खामियों का खुलासा इस रिपोर्ट में किया गया है। ग्लव्स, गाउन और अन्य महत्वपूर्ण उपकरणों की खरीद में हुई निराधार खर्चों ने करदाताओं के लिए अरबों पाउंड का बोझ बनाया।
सरकार ने कोविड संक्रमण से बचाव के लिए पीपीई की आवश्यकता को समझा था, लेकिन योजना और खरीदारी में प्रक्रियात्मक कमियों के कारण यह महंगा साबित हुआ। ग्लव्स और गाउन जैसी वस्तुओं की खरीद में पारदर्शिता की कमी, पर्याप्त मूल्यांकन नहीं होना और जल्दबाजी में अनुबंध लेना मुख्य कारण रहे।
सरकारी योजना में कमियां
सरकारी विभागों ने मांग का सही आकलन नहीं कर पाए, जिससे खरीदी गई वस्तुओं की संख्या और गुणवत्ता दोनों पर सवाल उठे। महामारी की अनिश्चितता के कारण शीघ्र निर्णय लेना आवश्यक था, लेकिन इस प्रक्रिया में मूल्य तुलना और गुणवत्ता जांच को नजरअंदाज किया गया। इस वजह से कुछ उपकरण अत्यधिक कीमत पर खरीदें गए, जबकि दूसरी ओर उन्हें स्टोरिंग में भी समस्याओं का सामना करना पड़ा।
बजट का भारी बोझ
पीपीई खरीदारी से जुड़ी सरकारी जानकारी से पता चलता है कि केवल ग्लव्स और गाउन पर ही अरबों पाउंड खर्च हो गए। इनमें से कुछ सामानों की लागत असाधारण रूप से अधिक थी। विशेषज्ञों ने कहा कि अगर योजना और निगरानी बेहतर होती, तो इस राशि की बचत संभव थी।
इसके अलावा, कई कंट्रैक्ट्स को बिना उचित प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया के दिया गया, जिसके कारण मूल्य वृद्धि हुई। यह करदाताओं के पैसे के दुरुपयोग का संकेत माना जा रहा है।
भविष्य के लिए सुझाव
विशेषज्ञों और जांचकर्ताओं ने सरकार को सलाह दी है कि आपातकालीन स्थिति में ठोस योजना और अनुबंध प्रक्रिया को सुव्यवस्थित किया जाना चाहिए। खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता, उचित मूल्यांकन और गुणवत्ता नियंत्रण आवश्यक है जिससे भविष्य में ऐसी गलतियां न दोहराई जाएं।
सरकार ने इन मुद्दों की जांच के लिए एक स्वतंत्र समिति गठित की है जो पूरी प्रक्रिया की समीक्षा कर रही है और सुधारात्मक सुझाव प्रस्तुत करेगी।
अंततः, यह रिपोर्ट हमें बताती है कि महामारी जैसी कठिन परिस्थितियों में भी विनियमन और जवाबदेही बनाए रखना क्यों जरूरी है। इससे न केवल संसाधनों की बचत होगी, बल्कि नागरिकों का विश्वास भी मजबूत होगा।

