नई दिल्ली। विश्व भर में 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की ओर ध्यान केंद्रित करता है। इस वर्ष 2026 के पृथ्वी दिवस पर भारत के समक्ष एक गंभीर चुनौती है, जो प्लास्टिक कचरे को लेकर बढ़ती समस्या के साथ जुड़ी हुई है। जहां पारंपरिक कचरा प्रबंधन प्रणाली पर ध्यान केंद्रित किया जाता रहा है, वहीं आज हमें उस प्रणाली की जड़ तक जाकर स्थिति को समझने और सुधारने की जरूरत है जो बार-बार डिस्पोजेबल प्लास्टिक उत्पादों का उत्पादन करती रहती है, जिनका कोई स्थायी ‘आफ्टरलाइफ़’ नहीं होता।
भारत में प्लास्टिक का उपयोग तेजी से बढ़ा है, खासकर डिस्पोजेबल पन्नी, थैले, बोतलें और पैकेजिंग सामग्री की मांग ने पर्यावरण पर बड़ा दबाव डाला है। इसके साथ ही पुनर्चक्रण और उचित निपटान की कमी, प्रणालीगत खामियां और अवैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन इस संकट को बढ़ा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल प्लास्टिक कचरे के संग्रहण और निपटान पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पूरे उत्पादन-उपयोग-निपटान चक्र को बदलना होगा।
भारत सरकार ने अनेक योजनाएं और नियम लागू किए हैं, जैसे कि प्लास्टिक कचरा नियंत्रण नियम 2016 और इसके संशोधन, जिससे प्लास्टिक उत्पादन में कमी लाई जा सके। इसके बावजूद देश में प्लास्टिक उत्पादन में निरंतर वृद्धि हो रही है। इसका एक बड़ा कारण हो सकता है उपयोगकर्ताओं और निर्माताओं के बीच जिम्मेदारी का अभाव और आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति। कई बार समस्या के लिए सरकार, उद्योग और उपभोक्ता एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं, जिससे समाधान की दिशा में गति धीमी पड़ती है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या का स्थायी समाधान तभी संभव होगा जब हम पूरे उत्पादन तंत्र को पारदर्शी, जवाबदेह और पर्यावरण-संगत बनाएंगे। इसके लिए नवाचार, प्लास्टिक विकल्पों का विकास, कड़े नियम और जागरूकता जरूरी है। प्लास्टिक उद्योग को भी टिकाऊ पैकेजिंग और पुनः उपयोगी उत्पाद बनाकर भूमिका निभानी होगी। साथ ही उपभोक्ताओं का व्यवहार भी बदलना आवश्यक है, ताकि प्लास्टिक के स्थान पर पर्यावरण के अनुकूल विकल्प अपनाए जा सकें।
इस पृथ्वी दिवस पर, भारत के लिए यह एक चेतावनी भी है कि पारंपरिक प्लास्टिक कचरा प्रबंधन से आगे बढ़कर पूरे सिस्टम का पुनरावलोकन और सुधार ज़रूरी है। केवल प्लास्टिक उत्पन्न करने वाले और उपभोग करने वाले के बीच जिम्मेदारी बाँटने के बजाय, सभी हितधारकों को मिलकर एक एकीकृत और सतत प्रणाली विकसित करनी होगी, ताकि हमारी पृथ्वी को प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्त रखा जा सके।

