माही चौथ व्रत, आचार्य समुदाय में करवा चौथ के साथ-साथ मनाए जाने वाले तेरह विशेष चौथ व्रतों में से एक महत्वपूर्ण व्रत है। यह व्रत महिलाओं द्वारा अपने पति एवं बच्चों की समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना के लिए रखा जाता है। माही चौथ का यह पावन पर्व जनवरी माह में मकर संक्रांति के आसपास मनाया जाता है।
इस व्रत को रखने वाली महिलाएं दिनभर निर्जला उपवास करती हैं और शाम को विशेष पूजा-अर्चना के बाद कथा सुनती हैं। माही चौथ कथा में व्रत की महत्ता तथा इससे जुड़ी पौराणिक मान्यताओं का चित्रण मिलता है, जिसमें बताया जाता है कि इस व्रत के पालन से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।
व्रत के दौरान महिलाएं मां पार्वती, भगवान शिव एवं गणेश जी की पूजा करती हैं। विशेष रूप से विनायक जी की कथा का उल्लेख इस व्रत में किया जाता है, जो संतान की रक्षा और कुल की समृद्धि का कारक माने जाते हैं।
माही चौथ व्रत की शुरुआत प्रातः काल स्नान और स्वच्छ वस्त्र धारण से होती है। दिनभर महिला गृहस्थी के कार्यों में संलग्न रहकर उपवास रखती हैं तथा शाम को पारिवारिक सदस्यों के साथ पूजा-पाठ कर व्रत खोलती हैं।
आगरवाल समुदाय में माही चौथ व्रत का विशेष स्थान है तथा इसका पालन बड़ी श्रद्धा और विधि-विधान से किया जाता है। यह व्रत महिलाओं के जीवन में आध्यात्मिक जागरूकता के साथ-साथ पारिवारिक सौहार्द्र भी बढ़ाता है।
समापन में यह कहा जा सकता है कि माही चौथ व्रत न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है बल्कि यह परिवार और समाज के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को मजबूत करने वाला एक प्रभावशाली पर्व भी है। इस त्योहार को लेकर महिलाओं में विश्वास और श्रद्धा का अद्भुत उदाहरण देखने को मिलता है।

