नई दिल्ली, 27 अप्रैल: हिंदू धर्म में शिव भगवान के एक प्रखर अवतार, वीरभद्र, की कहानी सदियों से प्रचलित है। यह कहानी भगवान शिव के क्रोध और न्याय के प्रतीक के रूप में देखी जाती है। इस विशेष अवतार का उद्भव तब हुआ जब शिव की पुत्री संति के पिता दाक्ष, जो ब्रह्मा के पुत्र और एक शक्तिशाली राजा थे, ने भगवान शिव का अपमान किया।
दाक्ष ने अपनी पुत्री संति का विवाह भगवान शिव से कराया, क्योंकि संति शिव के प्रति गहरी श्रद्धा और भक्ति रखती थीं। हालांकि दाक्ष को शिव से वैमनस्य था, फिर भी यह विवाह सम्पन्न हुआ। वर्षों बाद, दाक्ष ने एक भव्य स्वयंवर का आयोजन किया जिसमें उसने समस्त देवताओं और राजाओं को आमंत्रित किया, परंतु शिव को जानबूझकर छोड़ दिया। इस अपमान से संति अत्यंत कुंठित हुईं, लेकिन उन्होंने अपने पिता के सम्मान की खातिर इस समारोह में भाग लिया।
समारोह के दौरान दाक्ष ने शिव का कटु अपमान किया, जिससे संति का हृदय टूट गया। भगवान शिव के प्रति अपनी अनन्य भक्ति के बावजूद, वे इस अपमान को सहन नहीं कर सकीं और उन्होंने खुद को अग्नि में समर्पित कर दिया। इस घटना से शिव क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने वीरभद्र का सृजन किया, जो उनके गुस्से का प्रचंड अवतार था।
वीरभद्र ने दाक्ष के स्वयंवर में पहुंचकर समस्त अतिथियों का संहार किया और दाक्ष की हत्या भी की। इसके बाद शिव ने संति की अस्थियों को अपने हाथों से लेकर कैलाश पर्वत पर विसर्जित किया, जो शक्ति पीठ के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
यह कथा धार्मिक ग्रंथों में न्याय, भक्ति, और शक्ति के प्रतीक के रूप में वर्णित है। वीरभद्र का अवतार, शिव के क्रोध और धर्म के रक्षक के रूप में जानी जाती है। आज भी श्रद्धालु इस कहानी को याद कर भगवान शिव की महिमा और न्यायप्रिय चरित्र का सम्मान करते हैं। इस प्रकार, वीरभद्र का जन्म न केवल शिव की क्रोध का परिणाम था, बल्कि धर्म की रक्षा के लिए एक आवश्यक घटना थी।

