नई दिल्ली। निकोबार द्वीपसमूह के निवासियों की अनदेखी करते हुए केंद्र सरकार द्वारा लिटिल निकोबार, मरोए और मेन्चल द्वीपों पर तीन वन्यजीव अभयारण्यों की स्थापना योजना पर स्थानीय त्राइबल काउंसिल ने कड़ा विरोध जताया है। ट्राइबल काउंसिल ने स्पष्ट किया है कि इस महत्वपूण्न फैसले से पहले तटीय और द्वीपीय समुदायों से कोई परामर्श नहीं किया गया, जो उनके अधिकारों का उल्लंघन है।
त्राइबल काउंसिल के अनुसार, लिटिल निकोबार, मरोए और मेन्चल द्वीपों पर प्रस्तावित जातीय वन्यजीव अभयारण्य स्थानीय लोगों की जीवनशैली और आजीविका पर गंभीर प्रभाव डालेंगे। ये द्वीप पारंपरिक रूप से उनके निवास और संसाधनों के स्रोत रहे हैं, जिन पर उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति निर्भर है। काउंसिल की मांग है कि केंद्र सरकार बिना उनकी सहमति और योगदान के अभयारण्यों की योजना न बनाए।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि वन्यजीव अभयारण्यों के कारण वहां के आदिवासियों को विस्थापित किया जा सकता है और उनकी सांस्कृतिक स्वतंत्रता को ठेस पहुंचेगी। साथ ही, उनकी धरोहरों और परंपरागत जंगल प्रबंधन प्रणालियों की अनदेखी की जाएगी। इस तरह की योजनाओं में समुदायों को शामिल करना आवश्यक होता है ताकि संरक्षण और सांस्कृतिक सम्मान दोनों को संतुलित किया जा सके।
वहीं, केंद्र सरकार का मानना है कि ये अभयारण्य जैव विविधता संरक्षण के लिए आवश्यक हैं, खासतौर पर निकोबार द्वीपों के अनूठे पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा के लिए। उन्होंने दावा किया है कि स्थानीय लोगों की रूचि को ध्यान में रखते हुए योजनाएं बनाई जा रही हैं, लेकिन अदालतों और विभिन्न आदिवासी संगठनों से मिली प्रतिक्रिया इस पर सवाल उठाती है।
साथ ही, विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों के हितों के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण है, लेकिन इसे नजरंदाज करना या समुदाय की सहमति के बिना निर्णय लेना लंबे समय में प्रभावी साबित नहीं होगा।
निकोबारी क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण की आवश्यकता और स्थानीय सामाजिक-सांस्कृतिक सुरक्षा के लिए एक संवाद की जरूरत है, ताकि सभी पक्षों की आवाज सुनी जाए और उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान निकला जा सके। इस बीच, ट्राइबल काउंसिल ने अपनी मांगों को पुनः दोहराते हुए केंद्र सरकार से तत्काल संवाद स्थापित करने और प्रस्तावित अभयारण्यों की समीक्षा करने का आग्रह किया है।

