नई दिल्ली: मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET में हाल ही में पेपर लीक, बढ़े हुए स्कोर, कोचिंग संस्थानों से संबंध और शैक्षणिक संस्थाओं की असफलताओं के चलते विश्वसनीयता संकट गहराता जा रहा है। इसी बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने पेपर-आण-पेपर (PnP) पद्धति से कंप्यूटर आधारित टेस्ट (CBT) में अचानक बदलाव करने का निर्णय लिया है, जिससे सवाल उठने लगे हैं कि यह कदम दीर्घकालिक सुधार है या सिर्फ सार्वजनिक अविश्वास को कम करने के लिए त्वरित प्रतिक्रिया।
पिछले कुछ वर्षों में NEET परीक्षा की विश्वसनीयता पर कई आरोप लगे हैं। पेपर लीक की घटनाएं नियमित रूप से सामने आ रही हैं, जिससे परीक्षा प्रणाली की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न बन गए हैं। इसके अलावा, कई स्थानों पर कुछ छात्रों के स्कोर असामान्य रूप से बढ़े हुए पाए गए हैं, जो जाँच का विषय बने। कोचिंग संस्थानों का परीक्षा प्रणाली के साथ नजदीकी संबंध भी चर्चा में रहा है, जिससे परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता और न्यायसंगतता पर संदेह पैदा हुआ है।
इन सभी समस्याओं के बीच सरकार ने NEET परीक्षा को CBT में बदलने का फैसला लिया है, जिसके पीछे दावा किया गया है कि यह तकनीकी सुधार परीक्षा की पारदर्शिता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता बढ़ाएगा। परंतु विशेषज्ञ और समाज के कुछ वर्ग इस बदलाव को जल्दबाजी में उठाया गया कदम मान रहे हैं। उनका मानना है कि अकेले तकनीकी बदलाव से वे गहरे-rooted समस्याएं हल नहीं होंगी, जब तक व्यापक स्तर पर परीक्षा प्रक्रिया की समीक्षा और सुधार न किया जाए।
ऐसे आलोचक यह भी मानते हैं कि CBT के बदलाव का मकसद केवल सार्वजनिक अविश्वास को कम करना है, वास्तविक सुधार अर्थात् परीक्षाओं की सुरक्षा, समुचित निगरानी और शिक्षा संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करना नजरअंदाज किया जा रहा है। उनका यह भी तर्क है कि तकनीकी बदलाव से यदि तैयारी सही न हो तो छात्र, विशेषकर ग्रामीण और पिछड़े इलाकों के, असुविधा और तनाव का सामना कर सकते हैं।
हालांकि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने इस परिवर्तन को भविष्य की शिक्षा प्रणाली में महत्वपूर्ण कदम बताते हुए कहा है कि CBT के द्वारा परीक्षा में मनगढ़ंत गतिविधियों पर अंकुश लगेगा और डिजिटल माध्यम से अधिक पारदर्शिता आएगी, परन्तु यह देखना बाकी है कि यह बदलाव दीर्घकालिक समाधान साबित होता है या केवल तात्कालिक समस्या शमन का प्रयास।
NEET परीक्षा भारत में मेडिकल शिक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण द्वार है, और इसकी विश्वसनीयता बनाए रखना नितांत आवश्यक है। ऐसे में भविष्य में देखना होगा कि CBT के तहत यह परीक्षा किस हद तक निष्पक्ष और प्रभावी होती है, और क्या यह कदम छात्र, अभिभावक और शिक्षाविदों के विश्वास को पुनः स्थापित कर पाता है या नहीं।

