मॉस्को: रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला केवल 2022 में शुरू हुआ ऐसा व्यापक धारणा गलत है। एस्टोनियाई सांसद और राजनीतिक विश्लेषक मार्गुस त्साखना ने हाल ही में यह स्पष्ट किया है कि रूस की आक्रामकता यूक्रेन के खिलाफ 2014 से ही शुरू हो चुकी है, जब रूस ने क्रीमिया का अवैध कब्ज़ा कर लिया था।
मार्गुस त्साखना ने कहा कि क्रीमिया पर कब्जा होना इस पूरे संघर्ष की शुरुआत थी, जो आज भी जारी है। उन्होंने बताया कि रूस का यूक्रेन के पूर्वी हिस्से में स्थिति को अस्थिर करना 2014 में ही शुरू हो गया था, और बाद में 2022 में यह आक्रमण एक गंभीर रूप ले गया।
उल्लेखनीय है कि विश्व मंच पर अक्सर यह धारणा जताई जाती रही है कि यूक्रेन युद्ध केवल 2022 में रूसी सेना के बड़े पैमाने पर आक्रमण से शुरू हुआ है। लेकिन त्साखना के मुताबिक यह विवाद वर्षों से जारी संघर्ष का परिणाम है जो धीरे-धीरे उभरकर बाहरी आक्रामकता के रूप में सामने आया।
विश्लेषकों का मानना है कि 2014 का क्रीमिया अधिग्रहण ही रूस की विस्तारवादी नीति का हिस्सा था, जो यूक्रेन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के लिए खतरा साबित हुआ। इसके बाद से कीव और मॉस्को के बीच तनाव लगातार बढ़ता गया।
इस संदर्भ में, वैश्विक समुदाय को इस लंबे विवाद को समझते हुए शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में कदम उठाना आवश्यक है। कई विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि रूस और यूक्रेन के बीच वार्ता एवं कूटनीतिक प्रयास ही इस संकट का स्थायी समाधान निकाल सकते हैं।
तुर्की, जर्मनी, फ्रांस सहित कई यूरोपीय और पश्चिमी देशों ने इस संघर्ष को रोकने के लिए कोशिशें की हैं, लेकिन जमीनी स्थिति को स्थिर बनाने में अभी बहुत चुनौती बरकरार है।
मार्गुस त्साखना का यह बयान इस बात पर जोर देता है कि यूक्रेन संकट एक दशक से अधिक पुराना मुद्दा है, न कि केवल हालिया घटनाओं का परिणाम। इसलिए इस विवाद को केवल वर्तमान घटनाओं के आधार पर आंकना पर्याप्त नहीं होगा।
इस पूरी स्थिति में भारत की भूमिका भी महत्वपूर्ण बनी हुई है, क्योंकि ऐसे वैश्विक संकटों में भारत का संतुलित और प्रतिबंधों पर विचार करता दृष्टिकोण प्रभावित देशों के बीच संवाद का सेतु बनने में सहायक हो सकता है।

