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नई दिल्ली: देश के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण जैव विविधता अध्ययन में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। पंजाब के ज़ूलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (ZSI) और प्रोफेसर रामकृष्ण मोरे कॉलेज की टीम ने प्रायद्वीपीय भारत के तिलचट्टों (cockroaches) के लिए पहली और सबसे बड़ी डीएनए बारकोड संदर्भ पुस्तकालय विकसित की है। यह पहल तिलचट्टों के वैज्ञानिक वर्गीकरण और संरक्षण के लिए एक नई दिशा प्रदान करती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, भारत में तिलचट्टों की कुल 191 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से लगभग 60 प्रतिशत प्रजातियां देश की ही स्थानीय या एंडेमिक हैं। तिलचट्टे आमतौर पर मानव जीवन में अवांछित कीट माने जाते हैं, लेकिन उनका पारिस्थितिक तंत्र में महत्वपूर्ण स्थान है। वे पर्यावरण के जैविक चक्र में कार्बनिक पदार्थों को तोड़ने का कार्य करते हैं, जिससे प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है।

प्रोफेसर रामकृष्ण मोरे कॉलेज की शोध टीम ने इस पुस्तकालय के निर्माण में नवीनतम डीएनए बारकोडिंग तकनीकों का उपयोग किया, जिससे तिलचट्टों की पहचान करना अधिक सटीक और आसान हो गया है। डीएनए बारकोडिंग, जिसे ‘जीन टैगिंग’ भी कहा जाता है, किसी प्रजाति के जीनोमिक डेटा का विशिष्ट हिस्सा पहचानने के लिए उपयोग की जाती है, जिससे भ्रमित प्रजातियों के बीच सही अंतर संभव होता है।

ZSI के विशेषज्ञों ने बताया कि इस बारकोड पुस्तकालय के माध्यम से न केवल तिलचट्टों की विविधता का सही आंकलन हो सकेगा, बल्कि पर्यावरणीय परिवर्तनों और जलवायु संकट के प्रभावों को समझने में भी मदद मिलेगी। इससे भविष्य में संरक्षण योजनाएं बनाना अधिक प्रभावी होगा।

यह अध्ययन भारत की जैव विविधता के महत्व को रेखांकित करता है और स्थानीय प्रजातियों के संरक्षण पर जोर देता है। भारत के विभिन्न हिस्सों में पाए जाने वाले तिलचट्टों के डीएनए डेटा को संग्रहित कर, वैज्ञानिकों ने देश के कीट विज्ञान और पारिस्थितिकी पर एक ठोस आधार तैयार किया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के अनुसंधान से न केवल कीट विज्ञान में बल्कि समग्र प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में भी नई क्रांति लाई जा सकेगी। भविष्य में यह तकनीक अन्य कीट समूहों, पौधों और जीवों के अध्ययन में भी व्यापक रूप से उपयोग की जाएगी।

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