नई दिल्ली। कार-टी सेल थेरेपी, जिसे शुरुआत में आक्रामक रक्त कैंसर के इलाज के लिए विकसित किया गया था, अब खुद को एक संभावित क्रांति के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, खासकर स्वप्रतिरक्षित (ऑटोइम्यून) रोगों के उपचार में। वैज्ञानिक अब इस तकनीक का उपयोग ल्यूपस, मल्टीपल स्क्लेरोसिस और रूमेटोइड आर्थराइटिस जैसे गंभीर ऑटोइम्यून बीमारियों के इलाज में कर रहे हैं।
ऑटोइम्यून रोगों में शरीर की इम्यून प्रणाली गलती से अपने ही स्वस्थ ऊतकों पर हमला कर देती है, जिसकी वजह से अनेक बार मरीजों को जीवनभर के लिए इम्यून दबाने वाली दवाएं लेनी पड़ती हैं। CAR-T थेरपी इस दृष्टि से खास है क्योंकि यह इम्यून प्रणाली की उन कोशिकाओं को सीधे लक्षित कर सकती है जो इस आक्रमण के लिए जिम्मेदार होती हैं।
इस उपचार में, मरीज की खून से T सेल्स निकाले जाते हैं तथा उनका जैविक संशोधन किया जाता है, ताकि वे विशेष रूप से लक्षित सेल्स को मार सकें जो रोग को बढ़ावा देते हैं। इसके बाद इन संशोधित T सेल्स को वापस मरीज के शरीर में डाला जाता है ताकि वे सक्रिय होकर रोगजनित कोशिकाओं को समाप्त कर सकें।
विशेषज्ञों का कहना है कि CAR-T थेरपी ऑटोइम्यून रोगों के लिए संभावित लंबे समय तक आराम (रेमिशन) प्रदान कर सकती है, जिससे मरीजों को लगातार दवाइयों पर निर्भर रहने की जरूरत कम हो सकती है। इसके अलावा, यह पारंपरिक उपचारों की तुलना में अधिक लक्षित और प्रभावी तरीका साबित हो रहा है।
हालांकि, इस तकनीक पर अभी व्यापक शोध और क्लीनिकल परीक्षण चल रहे हैं ताकि इसकी प्रभावशीलता और सुरक्षात्मक पहलुओं को पूरी तरह समझा जा सके। विशेषज्ञों ने यह भी कहा है कि चिकित्सा क्षेत्र में यह एक अहम कदम साबित हो सकता है, जिसे आने वाले वर्षों में कई रोगियों के जीवन में बदलाव लाने की क्षमता है।
इस नया उपचार विकल्प होने के नाते, इस पर विश्व के प्रमुख चिकित्सा संस्थान और फार्मास्यूटिकल कंपनियां काम कर रही हैं, ताकि इसे अधिक किफायती और व्यापक रूप से उपलब्ध करवाया जा सके।
संक्षेप में कहा जाए तो CAR-T थेरपी ने न केवल कैंसर के इलाज में नए आयाम खोले हैं, बल्कि अब यह ऑटोइम्यून रोगों के उपचार में भी एक नई उम्मीद जगाता नजर आ रहा है। आगे के शोध और परीक्षणों के आधार पर यह तकनीक भविष्य में लाखों मरीजों के लिए राहत का स्रोत बन सकती है।

