कोलकाता, 27 अप्रैल: पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी की एसआईआर समिति के अध्यक्ष प्रसेंजित बोस ने कहा है कि हाल ही में चुनाव आयोग के ट्रिब्यूनल्स द्वारा राज्य के मतदाता सूची में 60 प्रतिशत से अधिक नामों को बहाल किया जाना यह स्पष्ट करता है कि 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कई वास्तविक मतदाताओं को उनका मतदान का अधिकार रोका गया था।
बोस ने बताया कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है, लेकिन जब कई वैध मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से अचानक हटा दिए जाते हैं तो इससे उनकी भागीदारी बाधित होती है। उन्होंने कहा कि ट्रिब्यूनल्स के फैसले यह दर्शाते हैं कि इस त्रुटि को सुधारा गया है, लेकिन प्रश्न उठता है कि इससे पहले ऐसे मतदाता कैसे वंचित हुए।
उन्होंने आगे कहा, “वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने का मामला केवल संख्या का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों का है। एक भी सही मतदाता को मतदान से वंचित करना, पूरे चुनाव की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है। ट्रिब्यूनल्स ने जो सुधार किया है, वह भाजपा और अन्य दलों के दावों को भी चुनौती देता है कि चुनाव निष्पक्ष नहीं था।”
पश्चिम बंगाल के चुनाव आयोग ने भी इस स्थिति को संज्ञान में लेते हुए उच्चस्तरीय समिति गठित की है, जो मतदाता सूची सुधार और पूर्व में हुए विसंगतियों की जांच करेगी। बोस ने कहा कि कांग्रेस पार्टी ऐसी किसी भी अनियमितता के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करती है ताकि भविष्य में चुनाव और अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष हो सकें।
विशेषज्ञों का मानना है कि निर्वाचन प्रक्रिया में सुधार से राजनीतिक स्थिरता और मतदाताओं का लोकतंत्र में विश्वास बढ़ेगा। बोस ने सभी दलों से संवाद और सहयोग की अपील की ताकि लोकतंत्र को मजबूत किया जा सके। उन्होंने जनता से भी मतदान के महत्व को समझने और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सजग बने रहने का आवाहन किया।
अंततः, प्रसेंजित बोस का यह कथन पश्चिम बंगाल में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति चिंता और सुधार की जरूरत पर केंद्रित है, जो आगामी चुनावों की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।
