श्रीनगर, 27 अप्रैल 2024: कश्मीर घाटी की सांस्कृतिक पहचान चिनार के पेड़ों की घटती संख्या ने पर्यावरण प्रेमियों के भीतर चिंता की लहर दौड़ा दी है। ऐसे में 42 वर्षीय निवासी अब्दुल आहद खान एक हरित अभियानी के रूप में उभरे हैं, जिन्होंने घाटी में अब तक 1,500 से अधिक चिनार के पौधे रोपे हैं। उनका यह प्रयास न केवल पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण है बल्कि स्थानीय जैव विविधता को बचाने की दिशा में भी एक बड़ी पहल माना जा रहा है।
अब्दुल आहद खान ने मीडिया को बताया कि उन्होंने यह काम अपने व्यक्तिगत जुनून और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी के चलते शुरू किया था। “जब मैंने देखा कि हमारे चिनार के पेड़ दिनोंदिन कम हो रहे हैं, तो मुझे लगा कि मुझे कुछ करना चाहिए। मैं चाहता हूं कि मेरी आने वाली पीढ़ी भी इस खूबसूरत पेड़ की छाया में सुख-शांति का अनुभव करे,” उन्होंने कहा।
चिनार कश्मीर का एक प्रतीकात्मक पेड़ है, जो न केवल घाटी की प्राकृतिक सुंदरता का हिस्सा है बल्कि स्थानीय संस्कृति और इतिहास में भी इसकी अहमियत है। पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और मानव जनित दबावों के कारण चिनार के वृक्षों की संख्या में कमी आई है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, यदि आज ही इनकी कटाई पर नियंत्रण नहीं मिला, तो भविष्य में यह पेड़ विलुप्त होने की कगार पर पहुंच सकते हैं।
अब्दुल आहद खान के अनुसार, उन्होंने अपने अभियान की शुरुआत अपने घर के आसपास क्षेत्रों से की। धीरे-धीरे उनके प्रयासों को स्थानीय समाज का समर्थन मिला और आज यह आंदोलन प्रभावी रूप लेने लगा है। उन्होंने स्थानीय प्रशासन और गैर-सरकारी संगठनों के साथ मिलकर चिनार के पौधारोपण और संरक्षण के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किए हैं।
इस पहल को पर्यावरणविद और स्थानीय लोग सराहना दे रहे हैं। डॉ. फरहान वानी, पर्यावरण विशेषज्ञ, ने बताया, “अब्दुल जैसे लोग ही पर्यावरण संरक्षण की दिशा में जागरूकता बढ़ाते हैं। उनका प्रयास चिनार के साथ-साथ पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा में अहम भूमिका निभा रहा है।”
इसके साथ ही, अब्दुल आहद खान युवाओं को भी प्रकृति संरक्षण के लिए प्रेरित कर रहे हैं। वे स्कूलों और कॉलेजों में जाकर पर्यावरण शिक्षा देते हैं और पौधारोपण अभियानों में युवाओं को शामिल करते हैं। उनका मानना है कि जागरूक सामुदायिक सहभागिता के बिना कोई भी पर्यावरण संरक्षण प्रयास सफल नहीं हो सकता।
इस तरह, घाटी में चिनार के पेड़ों की रक्षा तथा नए पौधारोपण की पहल न केवल एक स्थानीय हरित क्रांति है, बल्कि यह एक सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन के तौर पर भी उभर रहा है। अब्दुल आहद खान की यह हरित crusade सीधेतौर पर कश्मीरी समाज के हृदय को छू रही है और पर्यावरण संरक्षण के महत्व को गहराई से समझने की प्रेरणा दे रही है।
जैसे-जैसे उनकी यह पहल फैलती जा रही है, कश्मीर में हरियाली लौटाने का सपना भी साकार होता नजर आ रहा है, जो आने वाले पीढ़ियों के लिए एक खुशहाल और हरित भविष्य की शुरुआत साबित होगा।

