राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने के तीन साल बाद, सलीम कुमार ने अपनी खराब सेहत के कारण सिल्वर स्क्रीन से दूर रहने का फैसला किया। 2011 में मिला यह सम्मान उन्हें व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन में एक नई पहचान दिलाया था, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं ने उनके कामकाज को प्रभावित किया। इसके बावजूद, उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई और वे जनता की यादों में जीवित रहे।
इस दौरान, सलीम कुमार की छवि पर आधारित मेमेस ने उनकी लोकप्रियता को और अधिक बढ़ावा दिया। इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर उनके हास्यपूर्ण संवादों और चेहरों का प्रयोग कर बनाए गए मेमेस ने लोगों के बीच सलीम कुमार को एक कूल और व्यंग्यात्मक आइकन के रूप में स्थापित किया। इनके ज़रिए उनके फैंस ने न केवल उनके अभिनय शैली की सराहना की बल्कि उनकी छवि को एक ताजा और मनोरंजक आयाम दिया।
विशेषज्ञों के अनुसार, ये मेमे समाज में व्याप्त व्यंग्य और समसामयिक मुद्दों पर चुटीले संदेश पहुंचाने के लिए एक प्रभावी माध्यम बन गए। सलीम कुमार के लोकप्रिय संवादों और हाव-भाव ने इस प्रक्रिया को सहज और रोमांचक बना दिया। यही कारण है कि बीमार रहने के बावजूद उनकी छवि सक्रिय और प्रासंगिक बनी रही।
सलीम कुमार ने अपने दौर में फिल्मों और टेलीविजन पर कई यादगार किरदार निभाए हैं, जिनमें उनकी सहजता और जमीन से जुड़ी अभिव्यक्ति ने दर्शकों का दिल जीता। उनकी भूमिका न केवल मनोरंजन का स्रोत रही, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों में भी उल्लेखनीय रही।
निष्कर्षतः, सलीम कुमार की चमक मेमेस की मदद से बनी रही और उनकी समाज में मौजूदगी को एक नई ऊर्जा मिली। यह साबित करता है कि कैसे डिजिटल युग में भी कलाकार की पहचान जीवित और सार्थक बनी रह सकती है, जब तक कि उनकी छवि और कार्यों को उचित सम्मान और स्थान मिलता रहे।

