वर्तमान में जलवायु परिवर्तन को लेकर वैश्विक स्तर पर हो रही चिंताएं काफी बढ़ गई हैं। हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक बड़ी रिपोर्ट में यह कहा है कि सबसे बुरा “डूम्सडे” या कयामती जलवायु परिदृश्य अब वास्तविकता से बहुत दूर है। इसके पीछे प्रमुख कारणों में उत्सर्जन वृद्धि की गति में कमी और नवीनीकृत ऊर्जा स्रोतों को अपनाना शामिल है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, पहले यह माना जाता था कि यदि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तेजी से बढ़ता रहा तो दुनिया एक ऐसे परिदृश्य का सामना कर सकती है, जिससे असामान्य और विनाशकारी जलवायु प्रभाव सामने आएंगे। यह परिदृश्य प्राकृतिक आपदाओं, गर्मी की लहरों, समुद्र स्तर वृद्धि से लेकर कृषि संकट तक फैल सकता था। लेकिन अब उत्सर्जन वृद्धि की दर धीमी होने और सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा जैसे स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों के बढ़ते उपयोग के कारण यह गंभीर स्तर पर पहुंचने की उम्मीद कम हो गई है।
हालांकि, यह अच्छी खबर होने के बावजूद भारतीय परिप्रेक्ष्य में चुनौतियां जारी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत जैसे विकासशील देश जिसमें जनसंख्या अत्यधिक है और बड़ी संख्या में लोग खेती और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं, उन्हें जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से सावधान रहना होगा। चाहिए कि भारत अपने नवीनीकृत ऊर्जा संसाधनों को और मजबूत करे, औद्योगिक उत्सर्जन को नियंत्रित करे तथा सतत विकास की दिशा में ठोस कदम उठाए।
सरकार ने भी हाल के वर्षों में हरित ऊर्जा परियोजनाओं पर जोर दिया है। देश में सोलर पावर प्लांटों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और कई राज्यों में पवन ऊर्जा का उत्पादन भी निरंतर बढ़ा है। जो भारत को स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन के रास्ते पर मजबूती से ले जा रहा है। फिर भी, जलवायु संकट के संदर्भ में नीतियों में निरंतर सुधार, तकनीकी नवाचार और जन-जागरूकता महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य पर्यावरण संघटनों की रिपोर्टों ने बार-बार यह दर्शाया है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना आवश्यक है ताकि जलवायु संकट से निपटा जा सके। भारत के लिए यह लक्ष्य बड़ा चुनौतीपूर्ण है, लेकिन संभव है यदि देश सामूहिक प्रयासों से उत्सर्जन में कटौती करता रहे और सतत विकास के सिद्धांतों को अपनाए।
इस प्रकार, जहां वैज्ञानिकों ने सबसे नकारात्मक जलवायु स्थिति को असंभव करार दिया है, वहीं यह हमें बोध कराता है कि सक्रिय भूमिका निभाना अभी भी अत्यंत आवश्यक है। जलवायु संरक्षण के लिए जीवनशैली में सुधार, स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में निवेश तथा पर्यावरण संरक्षण की समझ बढ़ाना भविष्य की चुनौतियों के मुकाबले भारत के लिए अहम होगा।
