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नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने उन दवाओं की कीमतों में वृद्धि को मंजूरी दी है जिन्हें रासायनिक चिकित्सा (कीमोथेरेपी) का आधार माना जाता है। यह कदम ऐसे समय में लिया गया है जब इन महत्वपूर्ण दवाओं की आपूर्ति में गंभीर कमी देखी जा रही है। विशेषज्ञों ने कहा कि सिसप्लैटिन (Cisplatin) और कार्बोप्लैटिन (Carboplatin) कीमोटेरेपी के क्षेत्र में रीढ़ की हड्डी के समान हैं और इनसे कैंसर के अनेक प्रकारों का सफल इलाज संभव होता है।

अग्रवाल ने बताया कि सिसप्लैटिन एवं कार्बोप्लैटिन का इस्तेमाल खासतौर पर फेफड़े, मूत्राशय, अंडाशय, और टेस्टिस कैंसर में किया जाता है। इन दवाओं के बिना कीमोथेरेपी को पूर्ण रूप से सफल माना जाना मुश्किल है। एजेंसीज और मेडिकल कम्युनिटी की तरफ से बताया गया कि दवाओं की उत्पादन लागत में वृद्धि और कच्चे माल की उपलब्धता में गिरावट के कारण केंद्र सरकार ने मूल्य समायोजन को जरूरी माना।

सरकार ने इस बारे में कहा कि यह निर्णय मरीजों को उच्च गुणवत्ता वाली दवाएं उपलब्ध कराने के लिए लिया गया है। हालांकि मरीज और स्वास्थ्य संगठनों की ओर से इस कदम की आलोचना भी की गई है क्योंकि वे इसे इलाज की लागत बढ़ाने वाला मान रहे हैं। कई NGOs ने कहा कि बढ़ी हुई दवा कीमतें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि उचित नियंत्रण और सब्सिडी के माध्यम से दवाओं की कीमतों को नियंत्रित किया जाना चाहिए ताकि सभी मरीजों को इन आवश्यक दवाओं तक समान पहुंच मिल सके। उन्होंने सरकार से इस मामले में निरंतर संवाद और पहल करने का आग्रह किया है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी बयान में कहा गया कि दवा उत्पादकों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित किया जाएगा कि आपूर्ति सुचारू रहे और दवाओं की गुणवत्ता में कोई कमी न आए। साथ ही, बढ़ी हुई कीमतों को अस्पतालों एवं मेडिकल स्ट्रक्चर में पारदर्शी तरीके से लागू किया जाएगा।

कीमोथेरेपी की backbone मानी जाने वाली ये दवाएं कैंसर से लड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और इनके सही समय पर और उचित कीमत पर उपलब्ध होना जीवन रक्षक है। सरकार का यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि देश में कैंसर रोगियों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। इन रोगियों के लिए प्रभावी एवं किफायती उपचार अभी भी एक बड़ी आवश्यकता है।

इस फैसले के बाद चिकित्सकों और औषधि विशेषज्ञों की नजर अब यह देखने पर है कि दवाओं की आपूर्ति और कीमतों में स्थिरता आएगी या नहीं। मरीज और उनके परिवार भी इस बदलाव का असर महसूस करेंगे क्योंकि इलाज की लागत पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है।

अंततः, केंद्र सरकार का यह निर्णय स्वास्थ्य नीति में संतुलन बनाने और रोगियों के हितों का ध्यान रखते हुए किया गया है, लेकिन इसे व्यापक रूप में लेकर अभी और आम राय बननी बाकी है। कीमोथेरेपी की backbone मानी जाने वाली इन दवाओं पर नजर रखे जाने की जरूरत बनी हुई है ताकि मरीजों को बेहतरीन चिकित्सा सुविधा मिल सके।

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