नई दिल्ली। हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण खोज की है, जो फेफड़ों के कैंसर का पता चलाने में क्रांतिकारी साबित हो सकती है। इस नई शोध में ’14-प्रोटीन सिग्नेचर’ नामक एक पैटर्न विकसित किया गया है, जो खून के नमूनों के माध्यम से फेफड़ों के कैंसर का पूर्वानुमान कई साल पहले ही लगा सकता है।
यह सिग्नेचर अभी भी अंतिम परीक्षणों से गुजर रहा है और इसके उपयोग से पहले इसे व्यापक जांच की आवश्यकता है। मूल रूप से इस अध्ययन का डाटा यूके, यूएस और पूर्वी एशिया की सीमित विविधता वाले जनसंख्या समूहों से लिया गया है। वैज्ञानिक मानते हैं कि यदि यह सिग्नेचर विभिन्न आबादी समूहों में समान रूप से प्रभावी पाया गया, तो यह फेफड़ों के कैंसर की शुरुआती पहचान के लिए एक विश्वसनीय माध्यम बन सकता है।
फेफड़ों का कैंसर विश्वभर में सबसे अधिक घातक कैंसरों में से एक है, जिसकी शुरुआत अक्सर बिना लक्षण के होती है। इस कारण से कई मामलों में मरीज तब तक गंभीर स्थिति में पहुँच जाते हैं जब तक कि उन्हें पता चलता है। इस नई खोज से यह उम्मीद है कि भविष्य में खून के सरल परीक्षण से ही शुरुआती चरण में कैंसर का पता चल सकेगा, जिससे इलाज के बेहतर परिणाम संभव हो सकेंगे।
वैज्ञानिकों ने बताया कि इस 14-प्रोटीन सिग्नेचर की पहचान से संबंधित एक विशेष जांच बनाने का कार्य अभी बाकी है, जो रक्त के प्लाज्मा में इन सभी प्रोटीनों का पता लगाने में सक्षम हो। इसके सफल विकास से डॉक्टरों को मरीजों की जांच और निदान में काफी मदद मिलने वाली है।
विशेषज्ञों ने यह भी कहा है कि इस तकनीक का व्यापक परीक्षण विभिन्न जनसांख्यिकीय समूहों और विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में किया जाना होगा, ताकि पता लगाया जा सके कि यह किस हद तक सार्वभौमिक तौर पर उपयोगी और प्रभावी है। इसके बाद ही इस नए परीक्षण को चिकित्सा क्षेत्र में अपनाया जाएगा।
फेफड़ों के कैंसर का खून के माध्यम से प्रारंभिक पता लगाने वाला यह प्रयास कोरोना महामारी के बाद भी चिकित्सा अनुसंधान के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी। इससे न केवल रोगियों को जल्दी इलाज मिलने में मदद मिलेगी, बल्कि चिकित्सा व्यय भी कम होगा, क्योंकि लम्बे और जटिल इलाज की जरूरत कम पड़ सकती है।
सरकारी और निजी स्वास्थ्य संगठन इस शोध का समर्थन कर रहे हैं और उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले वर्षों में इस तकनीक को व्यापक पैमाने पर लागू किया जा सकेगा। इस दिशा में और शोध और परीक्षण जारी हैं, और वैज्ञानिक लगातार इस तकनीक को और बेहतर बनाने के प्रयास कर रहे हैं।
