शिक्षा जगत में तकनीकी प्रगति के साथ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के उपयोग को लेकर नई नीतियाँ लगातार विकसित की जा रही हैं। इसके तहत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा हाल ही में जारी किए गए एआई नियमों ने गहरे विवाद को जन्म दिया है, जिससे रचनात्मकता के क्षेत्र में कई सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों की मानें तो ये नियम जहां उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बनाए गए हैं, वहीं उनकी कड़ी निगरानी से शिक्षा और शोध की स्वतंत्रता पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।
यूजीसी के नियमों में संस्थागत स्तर पर एआई उपयोग की निगरानी और इसकी पहचान को अनिवार्य किया गया है। हालांकि इसका मकसद शिक्षण प्रक्रिया की गुणवत्ता और प्रमाणिकता बनाए रखना है, लेकिन इससे कई विद्वान और शोधकर्ता चिंतित हैं। उनका तर्क है कि ऐसी कठोर निगरानी से खुला संवाद और स्वतंत्र वैचारिक विमर्श प्रभावित होगा। शोध की प्रगति के लिए आलोचनात्मक जांच और स्वतंत्र विचारों की आवश्यकता होती है, लेकिन जब अध्ययन पर नियंत्रण और भयाक्रांत माहौल बनता है, तो यह रचनात्मकता के लिए बाधक बन सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि संस्थागत निगरानी यदि अत्यधिक कठोर हो गई तो इसका परिणाम छुपे हुए उपयोग के रूप में सामने आ सकता है, जहां शोधकर्ता और विद्यार्थी एआई का गुप्त तौर पर उपयोग करें लेकिन खुलकर अपनी खोज और प्रयोग साझा न कर सकें। यह स्थिति शिक्षा के मूल सिद्धांतों के विपरीत है, जिनका उद्देश्य ज्ञान का स्वतंत्र आदान-प्रदान और आलोचनात्मक चेतना को बढ़ावा देना होता है।
शिक्षाविद् एवं मानसिकता विशेषज्ञों की राय है कि निगरानी आधारित व्यवस्था से भय और रक्षात्मक रवैया जन्म ले सकता है, जो अंततः शोधकर्ताओं और शिक्षकों की संकल्प शक्ति को कमजोर कर सकता है। इसके बजाय, एक सहायक और पारदर्शी माहौल विकसित करना चाहिए जहां एआई का उपयोग सकारात्मक रूप से और नैतिक सीमाओं के भीतर हो, ताकि शिक्षा में नवाचार और रचनात्मकता बनी रहे।
इस संदर्भ में, यूजीसी को चाहिए कि वह नियमों को पुनः समीक्षा करे और शिक्षण संस्थानों व शोध समुदाय की भावनाओं को समझते हुए ऐसी नीतियां बनाएं जो न केवल नियंत्रण करें, बल्कि रचनात्मकता का संरक्षण और प्रोत्साहन भी करें। खुली बहस, प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम बनाए जाएं ताकि एआई का सही उपयोग सुनिश्चित हो और शिक्षा क्षेत्र में संतुलन बना रहे।
अन्ततः, संस्थागत निगरानी और खुली चर्चा के बीच सामंजस्य स्थापित करना शिक्षा क्षेत्र के लिए आवश्यक है, ताकि तकनीकी उन्नति और मानवीय रचनात्मकता एक साथ चलते रहें। तभी उच्च शिक्षा का लक्ष्य साकार हो पाएगा और भविष्य के लिए उत्कृष्ट शोध व नवाचार संभव होगा।

