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फिल्म ‘अल्फा’ हाल ही में रिलीज़ हुई और इसमें आलिया भट्ट, बॉबी देओल और शर्वरी की जोड़ी ने दर्शकों का ध्यान खींचा। फिल्म में ये कलाकार हर पंच और किक में अपनी एनर्जी और व्यक्तित्व की छाप छोड़ते हैं। हालांकि, जबकि कलाकारों का प्रदर्शन सराहनीय है, पटकथा ने दर्शकों को वह उतना संतुष्ट नहीं किया जितना वे उम्मीद कर रहे थे।

आलिया भट्ट की भूमिका इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी है। उन्होंने एक पुराने और थके हुए स्क्रीनप्ले में अपनी दमदार उपस्थिति के कारण कहानी को नई जान दी है। बॉबी देओल और शर्वरी भी अपने किरदारों के साथ न्याय करते हैं और उनके किरदार में एक तरह की सहजता और असलीपन बरकरार रहता है।

फिल्म के तत्वावधान में, कलाकारों की मेहनत और ऊर्जा को महसूस किया जा सकता है। हर एक्शन सीक्वेंस में उनका उत्साह दिखता है, जो फिल्म को थोड़ी राहत देता है। लेकिन, पटकथा में कई जगह कमजोरियां नजर आती हैं। कहानी में वह जैविकता और ताजगी नहीं है जो दर्शकों को पूरी तरह बांध सके।

निर्देशक ने भले ही कलाकारों को अभिनव और प्रभावशाली बनाने की भरपूर कोशिश की हो, पर स्क्रिप्ट की कमी ने फिल्म की मजबूती को कम कर दिया है। संवाद कहीं-कहीं फ्लैट लगते हैं और कहानी का प्रवाह बीच में धीमा हो जाता है। ऐसे में फिल्म पूरे दर्शकों को स्क्रीन से जोड़े रखने में असफल दिखती है।

फिल्म ‘अल्फा’ का सबसे बड़ा आकर्षण इसके कलाकार हैं, विशेष रूप से आलिया भट्ट, जिन्होंने अपनी भूमिका में जान फूंक दी है। बॉबी देओल और शर्वरी भी इसका साथ देते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि उनकी मेहनत भी पटकथा की कमजोरियों को छुपा नहीं पाती।

निष्कर्षतः, ‘अल्फा’ एक ऐसी फिल्म है जिसमें काबिल कलाकार और दमदार अभिनय शामिल है, लेकिन कहानी और पटकथा उस स्तर की नहीं है जो इस फिल्म को एक यादगार फिल्म बना सके। निर्देशक को अपने लेखन और पटकथा में और सुधार की आवश्यकता है ताकि वे दर्शकों को किसी नये, ताज़ा और प्रभावशाली अनुभव से रूबरू करा सकें।

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