नई दिल्ली: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) के तहत कक्षा 6 से तीन-भाषा सूत्र लागू करने का निर्णय लिया है, लेकिन इस कदम ने देश भर में भाषा संबंधी अनेक समस्याएं और विवाद खड़े कर दिए हैं। इस नीति के कार्यान्वयन से शिक्षक-शिक्षिकाओं की छंटनी, पाठ्यक्रम संबंधी बाधाएं और अभिभावकों व छात्रों में असमंजस की स्थिति उत्पन्न हुई है। साथ ही कई विदेशी दूतावासों ने भी इस नीति को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की है।
मित्रि पोरेचा की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की भाषाई विविधता को ध्यान में रखते हुए तीन-भाषा सूत्र को लागू करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। इस नीति के अंतर्गत प्रत्येक छात्र को अपनी मातृभाषा, हिंदी और अंग्रेजी सीखनी होती है, लेकिन विभिन्न राज्यों में मातृभाषा और हिंदी के प्रति अलग-अलग दृष्टिकोण हैं। कई दक्षिणी राज्यों ने हिंदी के अनिवार्यता से आपत्ति जताई है, जिससे इस योजना को लागू करना और भी जटिल हो गया है।
शिक्षकों की कमी और उनके पुनर्वितरण ने स्थिति को गंभीर बना दिया है। कई स्कूलों में आवश्यक शिक्षक नहीं हैं जो तीनों भाषाओं की दक्षता से पढ़ा सकें, जिससे प्रमाणित शिक्षण की गुणवत्ता पर असर पड़ा है। इसके अलावा, अभिभावकों का मानना है कि इस नई नीति के कारण बच्चों पर बोझ बढ़ गया है, जिससे उनकी पढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
विदेशी दूतावासों ने भी इस नीति के बारे में अपनी चिंता प्रकट की है क्योंकि इससे विदेशी छात्रों के लिए भाषा सीखने की प्रक्रिया जटिल हो सकती है और उनके अध्ययन में व्यवधान आ सकता है। इसके कारण कुछ देशों ने अपने छात्रों को भारत में शिक्षा प्राप्त करने की योजना पुनः विचार करने के संकेत दिए हैं।
सरकारी और शैक्षिक विशेषज्ञ इस समस्या का समाधान खोजने में जुटे हैं। कुछ सुझावों में स्थानीय भाषा चुनने में अधिक लचीलापन, शिक्षक प्रशिक्षण और संसाधनों में वृद्धि शामिल हैं। सभी की सहमति है कि भारत जैसे बहुभाषी देश में शिक्षा नीति को लागू करना अत्यंत संवेदनशील और सतर्कता से किया जाना चाहिए।
अंत में, इस नीति के सफल कार्यान्वयन के लिए सभी हितधारकों- सरकार, शिक्षकों, अभिभावकों और छात्रों – के बीच सामंजस्य स्थापित करना आवश्यक होगा ताकि भारत की भाषाई एकता बनी रहे और शिक्षा की गुणवत्ता भी सुनिश्चित हो सके।

