छत्तीसगढ़ की लोक गायिका और पाण्डवानी की प्रमुख हस्ती तीजन बाई के निधन से समूचा देश स्तब्ध है। तीजन बाई ने अपनी अनूठी कला और अद्भुत अभिनय के माध्यम से लोककला पाण्डवानी को न केवल गांव-दोनों तक सीमित रखा, बल्कि उसे वैश्विक मंचों तक पहुँचाया। वे एक ऐसी कलाकार थीं जिन्होंने सामाजिक रूढ़ियों और पुरुष प्रधान व्यवस्था को चुनौती देते हुए अपनी कला को सम्मान और प्रतिष्ठा दिलाई।
तीजन बाई का जन्म छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गाँव में हुआ था, जहां बचपन से ही उन्हें लोककथाओं एवं गीतों से गहरा लगाव रहा। पाण्डवानी, जो महाभारत की कथाएँ लोकगायन शैली में प्रस्तुत करता है, उन्हें इससे जुड़ने का अवसर मिला और वे जल्दी ही इस विधा की महारत हासिल करने लगीं।
उनकी प्रस्तुति के दौरान भावों का अभिव्यक्ति, संवादों का प्रभावशाली अभिनय और स्वरों की मिठास देखने लायक होती थी। तीजन बाई ने इस कला को केवल परंपरागत रूप में न रखते हुए उसमें नवीनता और आधुनिकता का समावेश किया, जिससे यह युवा पीढ़ी में भी लोकप्रिय हो सकी।
सामाजिक मुख्यधारा में महिलाओं के योगदान को चुनौती देते हुए, तीजन बाई ने यह संदेश दिया कि कला में कोई लिंगभेद नहीं होता। वे एक आदर्श बनीं जिन्होंने लड़कियों और महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उनका संघर्ष और समर्पण छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए प्रेरणास्रोत है।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई पुरस्कार और सम्मान प्राप्त करने वाली तीजन बाई ने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को मजबूत किया। उनकी याद में लोक कला के संरक्षण और प्रचार-प्रसार की नई पहलें शुरु की जा रही हैं। आज जब हम उनके निधन की खबर सुनते हैं, तो उनकी विरासत को संजोने का दायित्व हम सभी का बन जाता है।
तीजन बाई का नाम सजीव उदाहरण है कि कैसे लोककला को विश्व मानचित्र पर पहचाना जा सकता है। उन्होंने न केवल अपनी कला से बल्कि अपने समर्पण और साहस से भी इतिहास रचा। उनकी आत्मा को शांति मिले और उनकी कला भारतीय संस्कृति के अमर स्तंभ के रूप में सदैव जीवित रहेगी।

